इकामतें ख़िलाफत इताअतें रसूल है


इकामतें ख़िलाफत इसलिए फर्ज़ है के वोह अल्‍लाह के रसूल की सुन्‍नत है, और उनके ईरशादे आली की बज़ा आवरी है। इस मामले में नबीए अकरम (صلى الله عليه وسلم) के उसवाए हसना की पैरवी ऐसे ही की जा़एगी जैसे नमाज़, रोज़ा और हज़ वगैराह ज़रूरियाते दीन की पैरवी की ज़ाती है। आपकी ये हैसियत खुद कुरआन ने यू मुकर्रर की है : ''वो अपनी ख्‍वाईश से कुछ नही कहते बल्‍के जो कुछ भी कहते हैं वो वह्नीये ईलाही होती है’’। और फरमाया ''जो अल्‍लाह के रसूल (صلى الله عليه وسلم) की इताअत करता है वो अल्‍लाह की इताअत करता है’’। पैगम्‍बर (صلى الله عليه وسلم) को मदीने में इस्‍लामी रियासत के क़याम के लिए अल्‍लाह तआला की रहनुमाई हासिल थी। आज़ ख़िलाफत रियासत के क़याम के लिए आपके तरीके व उसवा से रहनुमाई हासिल की जाएगी। फरमाया : ''कह दो ये मेरा रास्‍ता है, मै अल्‍लाह की तरफ बसीरत के साथ बुलाता हॅू और मैरे साथी भी''।

मराहिले दावते नबवी पहला मरहला :- रिसालते मोहम्‍मदी की शुरूआत इस पैगाम से हुई के :

ٱقۡرَأۡ بِٱسۡمِ رَبِّكَ ٱلَّذِى خَلَقَ (* ١ ) خَلَقَ ٱلۡإِنسَـٰنَ مِنۡ عَلَقٍ (* ٢ ) ٱقۡرَأۡ وَرَبُّكَ ٱلۡأَكۡرَمُ (* ٣ ) ٱلَّذِى عَلَّمَ بِٱلۡقَلَمِ ( ٤ *) عَلَّمَ ٱلۡإِنسَـٰنَ مَا لَمۡ يَعۡلَمۡ

''पडो़ अपने रब के नाम से जिसने पैदा किया, ईन्‍सान को एक लोथडे़ से पैदा किया, पडो़ तुम्‍हारा रब बहुत ही बख्‍्शने वाला है जिसने क़लम के ज़रिए सिखाया। इन्‍सान को नामालूम का ईल्‍म दिया।'' (तर्जुमा माअनी क़ुरआन-ए-हकीम, ईक़रा -1 से 5) 

सूरे अद्दुहा की आखरी आयत में यह कहा गया :

وَأَمَّا بِنِعۡمَةِ رَبِّكَ فَحَدِّثۡ
''अपने रब की रहमते बयान की कीजिए’’।

सबसे पहले रसूल अकरम (صلى الله عليه وسلم) ने अपने घराना और अपने यारेगार अबू बक्र (‍رضي الله عنه) को दावते हक़ दी। अबू बक्र की मदद से उन लोगों से राब्‍ता किया जिनके ईमान लाने की उम्‍मीद थी, हत्‍ता के इस्‍लाम की दावत मक्‍के के अन्‍दर ही फैलने लगी। ये इब्तिदाई मरहला तीन सालो तक चला इसमें मुश्‍रिकीन से बगैर किसी टकराव के सिर्फ ईमान की दावत पहुँचाई गई और जहालत के तरीक़ो को भी नही छेडा़ गया। फिक्र, नज़रिया और ततहीर की गई, ज़ाती तरबियत पर ज्‍़यादा तव्‍वजे दी गई ताके ऐसी टीम तैयार हो जाए जो अल्‍लाह के पैगाम की हामिल हो और आईन्‍दा जाहिलियत से होने वाले खुले टकराव के काबिल हो।

आगाजे़ वही के वक्‍त समाज के तसव्‍वुरात व विचार, मूल्‍यो व ज़जबात व क़वानीन सब गै़र-इस्‍लामी थे। समाज ज़ाहिलियत में मुब्तिला था। इस पसमन्‍ज़र में रसूल अकरम (صلى الله عليه وسلم) ने इब्‍तदा यहां से की पैरवी करने वाले के ईमान व अकीदे को मज़बूत किया और ज़ाहिली खयालात, इक़दार (Values) व रस्मों की ज़गह तौहिद ने ले ली। नबी صلى الله عليه وسلم अपने सहाबा رضی اللہ عنھم को दारूल अरकम में ज़मा करते और कुरआन की रहनुमाई के मुताबिक उनकी तालीम व तरबियत फरमाते। आज भी तुम्‍हे ज़़ाहिलियत हर तरफ से घेरे हुए है। आज भी इन्‍सानी मआशरा वैसे ही ज़ाहिली हो गया है जैसे इस्‍लाम से कब्‍ल था अगरचे हम इन्‍फरादी तौर पर मुसलमान है। लिहाजा़ इकामते दीन और ख़िलाफत की मुहिम भी मरहलों में शुरू होगी। पहले मरहले में इस्‍लामी तसव्‍वुरात का गहरा मुताला और अफराद की ऐसी अमली तरबियत होगी जो उन्‍हे इस्‍लामी ज़िन्दगी ज़ीने के लिए तैयार कर दे। इसके लिए सब्र व अज़मियत व इस्‍तकलाल की ज़रूरत होगी। इस्लाम और उसकी जीवन व्‍यवस्‍था पर ऐतमाद व यकीन के लिए इस्‍लाम और उसके निज़ामो का गहरा मुताला (Study) ज़रूरी है। एक ऐसी इज्तिमाईयत की तश्‍कील (स्‍थापना) की जरूरत होगी जो साफ तौर पर इस्‍लामी विचारो व अवधारणाओ पर यकीन रखें और दावत को बिला कम व कास्‍त और बगै़र किसी समझौते के लोगों तक पहुचाए।

टीम वर्क की जरूरत : बिखरे हुऐ लोग या व्‍यक्ति ख़िलाफत क़ायम नही कर सकते। यह एक इज्तिमाई फरीजा़ है और इसका तकाजा़ ये है के मुसलमान इज्तिमाई तौर पर काम करे। नबीऐ अकरम (صلى الله عليه وسلم) के सहाबा رضی اللہ عنھم भी इन्‍फरादी तौर पर काम नहीं करते थे बल्‍के आप उन्‍हें इज्तिमाई तौर पर हज़रत अरकम के घर ज़मा करते, जहां वोह इस्‍लाम के बारे में तालीम देते, नमाज़ पड़ते और हर काम को टीम वर्क के साथ करने की तरबियत करते। सहाबा ए इकराम رضی اللہ عنھم के इज्तिमाई तौर पर काम करने की बहुत सी मिसाले हैं। एक दिन सहाबाऐ इकराम رضی اللہ عنھم आए और आपस में कहने लगे के कुरैश नबीऐ अकरम (صلى الله عليه وسلم) की तिलावत के अलावा खास तौर पर कुरआन नहीं सुन सकें है। अब्‍दुल्‍लाह बिन मसूद ने फरमाया के वोह कुरैश को कुरआन सुनाकर रहेंगे, चुनांचे वोह काबा की तरफ गए और बुलन्‍द आवाज़ से कुरआन की तिलावत की, कुरैश ने ये देखते ही उन पर हल्‍ला बोल दिया और पीटने लगे। वोह सहाबा के पास लौटकर आए तो साथियो ने कहा के ''हमें इसी का डर था’’ फरमाया ''अल्‍लाह के दुश्‍मनों से जो नफरत कल थी आज ज्‍़यादा हो गई है। अगर आपकी मर्ज़ी हो तो मै कल फिर उनके सामने जाकर कुरआन पढूं’’। ''नही तुमने बहुत बडा़ काम कर दिया है जिस चीज़ को वोह सुनना नही चाहते थे तुमने उन्‍हें सुना दिया’’। दूसरी मिसाल ये है के जब हफ्शा में नज्‍जाशी ने मुसलमानों को इस्‍लाम में हज़रत ईसा के मकाम व मरतबे के बारे में कुरैश की शिकायतो और ईल्‍ज़ामात का ज़वाब देने के लिए बुलाया। वहां पहुचने पर मुसलमानों ने एक इज्तिमाह किया और तय किया के नज्‍जाशी के सामने बेकमो कास्‍त कुरआन में आया है वों बताया जाए, चुनांचे हज़रत जा़फर को नुमाईंदा बनाया गया कि वोह मुसलमानों की तरफ से बात करेंगे। चुनांचे उन्‍होंने नज्‍जाशी को भरे दरबार में फसीह व बलीग अन्‍दाज में पैगामे कुरआन सुनाया। जिसे सुनकर वोह निहायत मुतास्सिर हुआ और उसने मुसलमानो से कहा के ''मैरी रियासत में आपको कोई परेशानी नही होगी। यहां आप आजा़द है, जो भी तुम्‍हारे साथ ज्‍़यादती करेगा उसे सज़ा दी जाएगी’’।

राय आम्मा (जनमत) का मरहला (Making of Public Opinion) : 

दावत का शुरूआती मरहले से आवामी मरहले में मुन्‍तकली (transfer) इस आयात से जा़हिर होती है। ''पस आप इस हुक्‍म को जो आपको किया जा रहा है खोल कर सुना दीजिए और मुश्‍रिको से मुंह फेर लीजिए, आपसे जो लोग मसखरापन करते है उनकी सज़ा के लिए हम काफी है।'' इस अवामी मरहले में दाईमी (स्थाई) इन्‍कलाब ने कुरैश के दायराऐ ज़ाहिलियत से टकराव मोल लेने का आगाज़ किया। उनसे लाईलाहा इलल्‍लाह के ईक़रार की मांग की और कई ऐसे कदम उठाऐ कि इस्‍लाम बहस का मरकज़ (केन्द्र) और उनवान बन जाए। सबसे पहले आप (صلى الله عليه وسلم) ने अपने रिश्‍तेदारों और कुरैश के रईसो को अपने घर एक दावत पर बुलाया। अपनी दावत इनके सामने रखी और इनके मान लेने के नतीजे़ में ज़न्‍नत और उसके नेअमतो और ना मानने की नतीजे़ में दोज़ख की आग का ज़िक्र किया जिसकी सिफ्फत ये है के : ''जब हम जहन्‍नुम से कहेंगे के क्‍या तू भर गई, तो पूकारेगी, क्‍यों और भी आने वाले है’’। रसूलुल्लाह (صلى الله عليه وسلم)  ने सफा  पहाड की चोटी पर चड़कर भी आवाज़ लगाई और कुरैश के तमाम कबाईल को यूं पूकारा : ''मुझे   बताओ  अगर  मै  तुमसे  कहूं  के  दुश्मन  सुबह  या  शाम  पस  आया  ही चाहता  है  तो  क्या तुम मेरी तस्‍दीक करोगे। कहने लगे क्‍यों नही। कहा तो मैं तुम्‍हें एक बडे़ अजा़ब की वईद (चेतावनी) सुनाता हूँ  

इज्तिमाई अमल (संघठित कार्यवाही) की तीसरी मिसाल हज़रत हमज़ा رضي الله عنه और उमर इब्‍ने ख़त्‍ताब رضي الله عنه के ईमान लाने के बाद के इक्‍़दामात है के नबी (صلى الله عليه وسلم) ने सहाबा ईकराम رضی اللہ عنھم के दो ग्रुप तश्‍कील दिये। एक ग्रुप की क़ियादत हमज़ा رضي الله عنه कर रहे थे दूसरे की हज़रत उमर رضي الله عنه। फिर उन्‍होंने काबे के चारों में मार्च किया। इससे मक्‍का के लोगों को एक झटका लगा। पहली बार उन्‍हें ये एहसास हुआ के मुसलमानों की बुनियाद मज़बूत है। इस मुज़ाहिरे से पहले मुसलमानों ने इन्‍फरादी (व्यक्तिगत) तौर पर नमाज़ पडी़, दुआ की, फिर काबे में इज्तिमाई (सामुहिक) तौर पर नमाज़ पडी़। इन वाक्‍यात ने नबी (صلى الله عليه وسلم) और सहाबा رضی اللہ عنھم को दावत के मरहले तसादुम (टकराव) में दाखिल कर दिया।

इस मरहले में पैगम्‍बर (صلى الله عليه وسلم) ने मुसलमानो को एक मुत्‍तहित क़ौम और मुनज्‍़ज़म ग्रुप की शक्‍ल में पेश किया जो सोसायटी के ईक्‍दार (मूल्‍यो), तसव्‍वुरात व आमाल व जज़बात, तरीकाऐ इक्तिदार और मामलाते ज़िन्दगी, और व्‍यवस्‍था को बदलने और समाज़ को चैलेन्‍ज़ करने को उठा है। इस अमल के ज़रिये पैगम्‍बर ने जा़हिलियत से बगैर किसी समझौते के तसादुम (टकराव) मोल लिया। उन्‍होंने जाहिलियत की गिरोहबन्‍दी और दौलतमन्‍दी पर मबनी मूल्‍यों को चैलेन्‍ज़ किया जैसा कि जे़ल की आयत से जा़हिर है :

أَلۡهَٮٰكُمُ ٱلتَّكَاثُرُ ( ١* ) حَتَّىٰ زُرۡتُمُ ٱلۡمَقَابِرَ (* ٢ ) كَلَّا سَوۡفَ تَعۡلَمُونَ
''तुम्‍हें गफलत में डाल दिया है दुनियावी माल की हिर्स ने, हत्‍ता की तुम कब्रो में पहुंच जाते हो। हरगिज़ नही, अपने इस अमल का पूरा नतीज़ा भी देख लोगे’’। (तर्जुमा माअनी क़ुरआन-ए-हकीम, अत्तकासुर- 1 से 3)
मुफलिसो और महरूमो के बारे में कुरैश की सर्द और दोगलेपन के र‍वैय्ये पर तनकीद (आलोचना) करते हुए अल्‍लाह سبحانه وتعال  ने फरमाया :

أَرَءَيۡتَ ٱلَّذِى يُكَذِّبُ بِٱلدِّينِ ( ١* ) فَذَٲلِكَ ٱلَّذِى يَدُعُّ ٱلۡيَتِيمَ ( ٢* ) وَلَا يَحُضُّ عَلَىٰ طَعَامِ 
ٱلۡمِسۡكِينِ

'क्‍या तुमने उसे भी देखा जो रोज़े जजा़ को झूठलाता है, यही वोह इै जो यतीम को धक्‍के देता है और मिस्‍कीन को खिलाने की तरग़ीब नही देता’’  (तर्जुमा माअनी क़ुरआन-ए-हकीम, अल़ माऊन -1से 3) 

उनके अमली रवय्ये पर गिरफ्त करते हुए फरमाया :

وَيۡلٌ۬ لِّڪُلِّ هُمَزَةٍ۬ لُّمَزَةٍ ( ١* ) ٱلَّذِى جَمَعَ مَالاً۬ وَعَدَّدَهُ ۥ ( ٢* ) يَحۡسَبُ أَنَّ مَالَهُ ۥۤ أَخۡلَدَهُ ۥ ( ٣ *) كَلَّاۖ لَيُنۢبَذَنَّ فِى ٱلۡحُطَمَةِ
''बडी़ खराबी है नाप-तौल में कमी करने वालो की के जब लोगों से नाप कर लेते है तो पूरा लेते है और जब उन्‍हें नापकर या तौलकर देते है तो कम देते है’’ (तर्जुमा माअनी क़ुरआन-ए-हकीम, अल हुमज़ा- 1 से 4)
 
कुरैश के लीडरो से खिताब करते हुए कहा गया : 

تَبَّتۡ يَدَآ أَبِى لَهَبٍ۬ وَتَبَّ ( *١ ) مَآ أَغۡنَىٰ عَنۡهُ مَالُهُ ۥ وَمَا ڪَسَبَ ( ٢* ) سَيَصۡلَىٰ نَارً۬ا ذَاتَ لَهَبٍ۬ ( *٣ ) وَٱمۡرَأَتُهُ ۥ حَمَّالَةَ ٱلۡحَطَبِ ( ٤ ) فِى جِيدِهَا حَبۡلٌ۬ مِّن مَّسَدِۭ

'अबू लहब के दोनो हाथ टूट गये, वोह खुद हलाक हो गया। ना तो उसका माल उसके काम आया ना कमाई। वो अनक़रीब जलाने वाली आग में जलाया जायेगा और उसकी बीबी भी जो लकडियां ढ़ोने वाली है उसकी गर्दन में पौस्‍तगी बटी हुई रस्‍सी होगी’’ (तर्जुमा माअनी क़ुरआन-ए-हकीम, लहब-1 से 5)

कुरैश के एक सर्कश लीडर वलीद बिन मुगे़रा की ज़हनियत और नफ्सीयात पर यूं रोशनी डाली :

فَلَا تُطِعِ ٱلۡمُكَذِّبِينَ (* ٨ ) وَدُّواْ لَوۡ تُدۡهِنُ فَيُدۡهِنُونَ ( *٩ ) وَلَا تُطِعۡ كُلَّ حَلَّافٍ۬ مَّهِينٍ (١٠ ) هَمَّازٍ۬ مَّشَّآءِۭ بِنَمِيمٍ۬ ( *١١ ) مَّنَّاعٍ۬ لِّلۡخَيۡرِ مُعۡتَدٍ أَثِيمٍ ( ١٢ *) عُتُلِّۭ بَعۡدَ ذَٲلِكَ زَنِيمٍ ( *١٣ ) أَن كَانَ ذَا مَالٍ۬ وَبَنِينَ (* ١٤ ) إِذَا تُتۡلَىٰ عَلَيۡهِ ءَايَـٰتُنَا قَالَ أَسَـٰطِيرُ ٱلۡأَوَّلِينَ ( ١٥ ) سَنَسِمُهُ ۥ عَلَى
ٱلۡخُرۡطُومِ

''तुम झूठलाने वालो की ना मानो, वोह तो चाहते है के तुम ज़रा डीले पडो़ तो येह भी डीले हो जायेंगे। और तू किसी ऐसे शख्‍स का भी कहना ना मानना जो ज्‍़यादा कसमें खाने वाला बेवक़ार, कमीना, ऐबजू, चुगलखोर, भलाई से रोकने वाला, हद से बड़ जाने वाला गुनहगार, गर्दनकश भर साथ ही बेनसब हो। इसकी सरकशी सिर्फ इसलिए है के वोह माल वाला और बेटो वाला है, जब उसके सामने हमारी आयते पडी़ जाती है तो कह देता है के ये तो अगलो के किस्‍से है, हम भी इसकी सूंड (नाक) पर दाग देंगे’’। ( तर्जुमा माअनी क़ुरआन-ए-हकीम, अल क़लम- 8 से 16)    

कुरैश के साथ इस वैचारिक जंग में, जिसमें जाहिलियत के तमाम तसव्‍वुरात व अश्‍काल (शक्‍लें) पर शदीद चोट लगाई गई है, पैग़म्‍बर के ताल्‍लुक़ात शदीद तौर पर कशिदा (तनाव से भरे) हो गये। वोह आप (صلى الله عليه وسلم) के दुश्‍मन बनते चले गये। आप (صلى الله عليه وسلم) की दावत उनकी गुफ्तगू का मौजू़ बन गई। वोह एक-दूसरे को आपकी शख्‍सीयत के खिलाफ भड़काने लगे। उन्‍होंने आपके चचा अबु तालिब से भी शिकायत की के : ''हम इस बात को मज़ीद बर्दाश्‍त नही कर सकते के हमारे पुरखों को मलामत की जाए, रसूम व रिवाज़ का मज़ाक उडा़या जाए और हमारे खुदाओ की तौहिन की जाए’’।   

फिक्री मारका (वैचारिक जंग) और फिक्री तसादुम (वैचारिक टकराव) के इस मरह‍ले में जमात अपने आपको दावत के हामिल के तौर पर पेश करेगी और इस्‍लाम पर उसी एतमाद और भरोसे का इज़हार करेगी जो सहाबा को हासिल था। ये चीज़ बगैर इसके हासिल ना होगी के तमाम गै़र-इस्‍लामी इकदार (मूल्‍यों) निज़ामात (व्‍यवस्‍थाऐ), अफ्कार (विचार) व तसव्‍वुरात (अवधारणाओं) के खिलाफ एक अक्‍ली (intellectual) व फिक्री (ideological) जंग छेंड़ दी जाए। मौजूदा निज़ामों और इक़दार व तसव्‍वुरात में पाए जाने वाले करप्‍शन और खराबियों को साफ और बेनकाब करके ऐसा किया जा सकता है। ऐसी मुख़्लिस (शुद्ध) इस्‍लामी तहरीक को राईज़ व्‍यवस्‍था और विचारो व तसव्‍वुरात जो इस्‍लाम के खिलाफ हो, के खिलाफ एक फिक्री व अक्‍ली यलगार करनी चाहिए। और रसूलुल्लाह (صلى الله عليه وسلم) के मनहज़ (Method) की पैरवी में सरमायादारी, डेमोक्रसी, कम्युनिज़म (Communism), Nationalism (राष्‍ट्रवाद), हर दूसरे ईज्‍म को मुस्‍तरद करना चाहिए। गै़र-इस्‍लामी आमाल, इकदार (मूल्‍यो), क़वानीन और जवाबित (Code of Conduct) को चैलेन्‍ज करना चाहिए। समाज में बेदारी पैदा की जाए ताके लोग ग़ैर इस्‍लामी ख्‍यालात से निजा़त पाए। जो सदूर, सरदार, बादशाह, लीडर और शख़्सियत जो भी दावत के रास्‍ते में रूकावट बने उन्‍हें समाज के सामने बेनकाब करना चाहिए। उनकी साजिशें, ज्‍़यादतियां, इस्‍लाम के खिलाफ पॉलिसीयां कौम के सामने रखी जाए। यही वोह उस्‍वाए नबवी है और जो लोग इस पर अमल पैरा ना हो वोह सुन्‍नत और मनहज़े नबवी से भटके हुऐ है।

समझौता : जब कुरैश दलील व बुरहान के मैदान में नाकाम हो गए और रसूले अकरम (صلى الله عليه وسلم) को अपनी मुहिम से रोक नही सके तो उन्‍होंने सौदेबाजी़ और गुफ्तगू का आगाज़ किया। कुरैश के सरदारो ने कई नुमाइन्दे (delegates) नबीऐ करीब (صلى الله عليه وسلم) के पास भेजे़। उन्‍होने आप पर दौलत, क़ियादत (नेतृत्व) और सरमायादारी पेश की। आपने दावत पर समझौता और सौदेबाज़ी की तमाम पेशकशो को मुस्‍तरद (रद्द) कर दिया। जु़ल्‍म व जब्र और कामयाबी की ख्‍वाहिश अहले ईमान को इस पोजि़शन में ला सकती है के वोह समझौते के लिए सोचने लगे। लेकिन मनहज़े नबवी बताता है के यहां ना तो कोई समझौता हो सकता है, और ना आधा अधूरा हल चलता है। इस्‍लाम जा़हिलियत से समझौता नहीं कर सकता। ये नहीं होगा के आधा इस्‍लाम हो और आधी ज़ाहिलियत हो। पूरे तौर पर या तो शरियते ईलाहिया नाफिज़ होगी या नहीं।

وَأَنِ ٱحۡكُم بَيۡنَہُم بِمَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ وَلَا تَتَّبِعۡ أَهۡوَآءَهُمۡ وَٱحۡذَرۡهُمۡ أَن يَفۡتِنُوكَ عَنۢ بَعۡضِ مَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ إِلَيۡكَۖ

''और उनके दरमियान अल्‍लाह के हुक्‍म के मुताबिक फैसला कीजिए उनकी ख्‍वाईशात की पैरवी ना कीजिए। उनसे आगाह रहिए के ये आपको बाज़ अहकाम से ना फैर दें’’। (तर्जुमा मआनीऐ क़ुरआन मजीद, सूर: माईदा - 49)    

इस तरह किसी गै़र-इस्‍लामी गोर्वमेन्‍ट में इसीलिए शामिल हो जाना के बाज़ मामलात को वोह इस्‍लाम को नाफिज़ करेगी, मनहजे़ नबवी से मुताबकत नहीं रखता, बतदरीज़ (gradual) इस्‍लाम का निफाज़ इस्‍लाम और गै़र-इस्‍लाम को मिलाना है जो नामुमकिन है, इस तरह मनहजे़ नबवी मकसद में समझौते की ईजा़जत नही देता। मकसद ख़िलाफत की ईकामत (स्‍थापना) है। जो तमाम मुसलमानों की वाहिद क़ियादत होगी। इस मकसद में कोई समझौता नही हो सकता। नबीऐ करीम (صلى الله عليه وسلم) ने बनू आमिर की मदद लेने से इसलिए इन्‍कार कर दिया था के वोह नबीऐ करीम (صلى الله عليه وسلم) के बाद क़ियादत चाहते थे, आप (صلى الله عليه وسلم) ने बनू शअबान बिन शआलिया की पेशकश भी ठुकरा दी थी जिन्‍होंने ये शर्त रखी के वोह पैग़म्‍बर की तमाम अरबो से तो हिफाज़त करेंगे लेकिन ईरानियों से नही। मकसद कु़व्‍वत बराए कु़व्‍वत नही के अगर इस्‍लामी मनहज़ से इन्‍हराफ (किनारा) किया जायेगा तो इक़ामते ख़िलाफत के कोई माईने नहीं होगें। अगरचे इस मकसद का निशाना अल्‍लाह سبحانه وتعال की हाकमियत की इक़ामत है और इस्‍लामी निज़ामे ज़िन्दगी का क़याम है। ताहम हथमी निशाना या उद्देश्‍य रज़ाऐ ईलाही का हुसूल है। इस तरह इन्‍फरादी (व्‍यक्तिगत) या इज्तिमाई कोई भी काम हो सिर्फ अल्‍लाह की खुशनुदगी के लिए होना चाहिए किसी और की रज़ा के लिए नही। किसी जमात, उसकी क़ियादत और मिम्‍बरान के इख्‍लास का पता उनके कामों से चलेगा। इख्‍लास ही कामयाबी का रास्‍ता मुनव्‍वर करेगा, तभी अल्‍लाह की नुसरत हासिल होगी।

ज़ुल्‍म व जब्र : जब उनकी ये तदबीरे नाकाम हो गई तो कुरैश ने वहशियाना मजा़लिम शुरू कर दिये। जिन मुसलमानो को राईज समाज़ी निजाम़ में कोई तहफ्फुज़ हासिल ना था उन्‍हे ज्‍़यादा मुसिबते उठानी पडी़। उन्‍हे कै़द व बन्‍द में डाला गया, टॉर्चर किया गया और कई एक को मार दिया गया। उन्‍होंने खुद पैग़म्‍बर (صلى الله عليه وسلم) की जात को भी निशाना बनाया, इन पर सख्‍तीयां की, झूठे प्रोपगंडे किये और जिस्‍मानी नुकसान भी पहुचाना चाहा। इन वैहशाना मज़ालिम को देखकर पैग़म्‍बर (صلى الله عليه وسلم) ने सहाबा को हब्शा की तरफ हिज़रत की ईज़ाजत दी। कुरैश ने ये देखकर के सहाबा हबशा में आराम से है और उमर बिन खत्‍ताब और हमज़ा ने इस्‍लाम कुबूल कर लिया है, इस्‍लाम फैलता जा रहा है, तो उन्‍होंने पैग़म्‍बरे इस्‍लामे (صلى الله عليه وسلم), सहाबा (رضي الله عنه) और उनका साथ देने वाले बनू हाशिम और बनू मुत्‍तलिब के बाइकाट का मुहाईदा लिखा कर के इन लोगों से शादी ब्‍याह होगा ना खरीदो फरोख्‍त ना लेन-देन किया जाए। और उनको एक बौसिदा या बैकार सी घाटी शौएब अबु तालीब में मेहसूर (क़ैद) कर दिया। ये शदीद बायकाट नबूवत के सातवे साल से दसवे साल तक जारी रहा। इस बायकाट के खत्‍म होने के कुछ ही बाद पैग़म्‍बरे इस्‍लाम (صلى الله عليه وسلم) की ज़ोजा़ऐ मोहतरमा हज़रत खदीजा  رضي الله عنها और चचा अबु तालिब एक के बाद दिगर दोनो वफात पा गए। इस शदीद नुकसान के बाद इस साल को आम उल हज़्न (year of sorrow/दुख का साल) का नाम दिया गया इस तरह की कशमश के बाद इस्‍लामी तहरीक को आम लोगों के गैज़ व गज़ब का सामना करना पडा़। आज भी मुल्‍को के हुक्‍मरान इस जद्दोजहद में शरीक लोगों को जु़ल्‍म व जब्र का निशाना बनायेगें। कैद व बन्‍द, कत्‍ल, बायकाट, जिलावतनी और लानत व मलामत वगैराह का सामना करना पडेंगा। ये होना नागुज़ीर है इसके बावजूद भी ये अहले ईमान को अपने मक़सद से हटा ना सकेंगे। और वोह अपने नहज से वाबस्‍ता रहेंगे, अपने मकसद के मुताल्लिक समझौता ना करेंगे।

क़ुर्बानी : इकामते ख़िलाफत और इस्‍लाम की हाकमियत की बहाली की जद्दोजहद तमाम महबूबात की कुर्बानी मांगती है। इसका मुतालबा है के सब्र के साथ हर किस्‍म के जिस्‍मानी, रूहानी और माली नुकसानात बर्दाश्‍त किये जायेंगे। लिहाज़ा अहले ईमान को उन तमाम चीज़ो से अपने आपको बचाये, जो इस मिशन की राह में रूकावट हो। ये यक़ीन रखना चाहिए के ईमान वालो की आज़माईश अच्‍छे और बुरे की तमीज़ करने के लिए होती है। ये कानूने ईलाही है, जैसा कि फरमाया : ''बाज़ मुसलमान जो कुफ्फार की ईजा़ओ (सज़ाओ) से घबरा जाते है तो क्‍या उन लोगों ने ये ख्‍याल कर रखा है के वोह इतना कहने पर छूट जायेंगे, हम ईमान ले आए और उनको आज़माया ना जायेगा ? और हम तो ऐसे वाक्‍यात से उन लोगों को भी आज़मा चुकें है जो उनसे पहले (मुसलमान) हो गुजरे है। सौ अल्‍लाह तआला उन लोगों को जानकर रहेगा जो सच्‍चे थे (ईमान के दावे में)’’।   

वो अम्बिया और रसूल जिन्‍होंने अल्‍लाह سبحانه وتعال के हुक्‍म को नाफिज़ किया और वोह लोग जिन्‍होने उन नबियो और रसूलो की इत्तिबा की वोह तमाम ऐसे ही आज़माईशो से गुजरे हैं और अल्‍लाह سبحانه وتعال ने कुरआन मज़ीद में उनके मसाईब का बार बार जि़क्र किया है : ''क्‍या तुम्‍हारा ये ख्‍याल है के जन्‍नत में बेमशक्‍कत दाखिल हो जाओगे? हालांके तुमको उन मुसलमान लोगों सा कोई वाकिया पेश नही आया है जो तुमसे पहले गुज़र चुके है। उन पर मुखालिफीन के सबब ऐसी ऐसी तंगी और सख्‍ती वाक्‍ये हुई और मसाहिब से दो चार रहे उनको यहां तक जुम्बिशे हुई के उस ज़माने के पैग़म्‍बर तक जो उनके हमराह अहले ईमान थे बोल उठें की अल्‍लाह سبحانه وتعال की मदद मौजूद कब होगी? याद रखो बेशक अल्‍लाह سبحانه وتعال की मदद बहुत नज़दीक है।'' लिहाजा वोह मोमिनिन जो अहयाये ख़िलाफत की दावत के लिए खडे़ होंगे, उनके लिए ये ज़रूरी है के वो मसाईब व मशक्‍कतो और जुल्‍म व जब्र को बर्दाश्त करें। जालिम और जा़बिर हुक्‍मरानो की साजि़श इन्‍हे इस अज़ीम मकसद से मुंह फैरने पर मज़बूर ना कर दे और ना उनके अज्‍़म (हौसलों) को कमज़ोर कर पाए बल्कि मोमिनो को तो उन मसाइब व अलम (दुख दर्दों) का इन्‍तज़ार करना चाहिए और तैयार रहना चाहिए। अल्‍लाह سبحانه وتعال पहले ही बता चुका है के उसकी मदद तब ही आई जब उसके रसूल (सलातो अस्‍सलाम) भी मसाईब झेलते-झेलते क़दरे मायूस हो गए। लिहाज़ा ये तय है मदद और फतह तब ही आईगी जब मुश्किलात और मसाईब ज्‍़यादा बड जाए। चुनांचे मोमिन पर ज़रूरी है के वोह सब्र व इस्‍तेक़ामत पर रहे। वोह समझ ले कि इस दावत पर लब्‍बेक कहना उन्‍हें ज्‍़यादा मेहबूब हो बनिस्‍बत अपनी ज़ान व माल, खानदान और अपनी आराईशों के।

ईरशादे बारी तआला है : ''कह दो के अगर तुम्‍हारे बाप, बेटे, भाई, शोहर और कुनबे के लोग और वोह माल जो तुमने कमाये और वोह तिजारत जिसके मंदा पड जाने का तुम्‍हे खौफ है और वोह तुम्‍हारे मनपसन्‍द मकानात अल्‍लाह और उसके रसूल और उसके रास्‍ते में जिहाद से ज्‍़यादा मेहबूब हो तो इन्‍तजा़र करो हत्‍ता के अल्‍लाह अपना हुक्‍म लेकर आ जाए और अल्‍लाह फासिक लोगों को हिदायत नही दिया करता।’’

मदद व तआवुन की तलाश : आम अल हुज़्न यानी ग़म के साल के बाद पैग़म्‍बर (صلى الله عليه وسلم) ने मक्‍के के बाहर के कबिलो पर अपनी दावत को पेश किया। जब भी कोई मौका आता बतौर खास मौसमे हज़ में जब बहुत से क़बीले मक्‍के आते, आप उनको अपने ऊपर र्इमान लाने की दावत देते और अपनी हिफाज़त का मुतालबा करते, जब तक उन पर अपना पैगाम पूरी तरह से खोल कर ना सुना दे जिसकी जिम्‍मेदारी आपको दी गई है। जब पैग़म्‍बर ने अपने को सकीफ, किन्‍दा, बनु आमिर बिन साअसा, बनु कलब और बनु हनीफा के कई कबाईल पर पेश किया तो बनु आमिर ने कहा के अगर हम आपको तहफ्फज़ दें और अल्‍लाह आपको फतह याफ्ता कर दे तो क्‍या आपके बाद इक्तिदार हमको मिल जाएगा, आपने जवाब दिया के ये मुआमला अल्‍लाह के हाथ में है जैसे चाहेगा इनायत करेगा। अलगरज़ उनमें से कोई कबिला रसूलुल्लाह (صلى الله عليه وسلم) के तआवुन (मदद) के लिए तैयार ना हुआ।
 
इसी वक्‍त में जब रसूलुल्लाह (صلى الله عليه وسلم) ने अपने को अलग अलग कबाईल पर पेश कर रहे थे अक़बा में आपकी मुलाकात मदीने के कबीले खज़रज के कुछ लोगों से हुई। उन्‍होंने दावत का मुसबत (Positive) जवाब दिया और इस्लाम कबूल कर लिया। जब वोह मदीना वापस हुए तो उन्‍होंने वहां अपने दोस्‍त व अहबाब को पैग़म्‍बर और उनकी तालीमात के बारे में बताया और कबूले इस्‍लाम की दावत दी। दूसरे साल मदीने के 12 लोगों ने अल अकबा में आपसे बैअत की (उनको अंसार कहा गया) वोह मदीना के सहाबी के साथ लौटे जिन्‍होने उनको दीनी तालिमात सिखाई और इस्‍लाम की दावत मदीने में आम की। हत्‍ता के नबी (صلى الله عليه وسلم) मदीने में मारूफ हो गए और इस्‍लाम और पैग़म्‍बरे इस्‍लाम का चर्चा मदीने के घर-घर में पहुचने लगा। दूसरे साल मुसअब رضي الله عنه के साथ 43 आदमी और 2 खवातीन पैग़म्‍बरे इस्‍लाम से मिलने के लिए रवाना हुए। इस दूसरी बैअत को बैअतुल हरब (जंग की बैअत) कहा जाता है। इसके बाद आप (صلى الله عليه وسلم) ने सहाबा को हिज़रत करने का हुक्‍म दिया। कुछ ही अरसे के बाद अल्लाह के हुक्‍म से आप (صلى الله عليه وسلم)  खुद भी हज़रत अबू बक्र (رضي الله عنه) को लेकर मदीना हिजरत कर जाते है और वहां पहली इस्‍लामी रियासत कायम करते है।

राय आम्‍मा (Public Opinion) की अहमियत : समाज़ में इसी ख्‍याल की अहमियत होती है जिसे राय आम्‍मा (जनमत) की ताईद हासिल होती है, इन्‍फरादी (व्यक्तिगत) ख्‍यालात की अहमियत नही होती। राय अम्‍मा पर खास तौर से संघठनो के द्वारा की जाने वाली कार्यवाहियां असर डालने वाली होती है क्‍योंके इज्तिमाई शउर का नतीजा होती है। अफराद (व्‍यक्तियो) के फिक्र व ख्‍याल का इतना असर नहीं होता। क्‍योंके व्‍यक्तियो के शउर पर जमात का शउर गालिब आ जाता है। इसकी मिसाल ये है के कुरैश को राय आम्‍मा के दबाव में बायकाट को मन्‍सूख (रद्द) करना पडा़। हालांके अबू ज़हल और दूसरे सरदाराने कुरैश ने इसकी मन्‍सूखी की जबरदस्‍त मुखालिफत की थी। ना ये मुमकिन है ना ये ज़रूरी के मआशरे का हर फर्द दावत को कुबूल कर ले ताहम मआशरे की इज्तिमाई सौच और रूह इस्‍लामी होनी चाहिए। चुनांचे जब मुसअब बिन उमेर رضي الله عنه ने मदीने से लौट कर रिपोर्ट दी तो बताया के हर शख्‍स ने इस्‍लाम को कबूल नही किया लेकिन इस्‍लाम की रोशनी हर घर में पहुंच चुकी है और लोगों की इज्तिमाई सोच में इस्‍लाम है। इसी बुनियाद पर पैग़म्‍बर ने फैसला किया के मदीना इस्‍लामी मकाम का सदरे मकाम (केन्‍द्रीय स्‍थान) बन सकता है।

मआशरती (सामाजिक) राब्‍ते की अहमियत : अवामी राय मुस्‍तकिल राब्‍ते के ज़रिए बनाई जा सकती है। जो लोग समाज को बदलना चाहते हो उन्‍हें लोगों के साथ रहना होगा। इस मामले में इन्‍फरादियत (व्‍यक्तित्‍ववाद) और जल्‍दबाजी़ से काम नही चल सकता। समाज को इस्‍लाम के हक़ में शदीद अक्‍ली व फिक्री व सियासी जद्दोजहद के ज़रिए जीता जा सकता है। इसीलिए ज़रूरी है के मुसलमान तहरीको को हर मैदान में वोह काम करने चाहिए जो उम्‍मत के हक़ में हो और उम्‍मत को जु़ल्‍म व ज्‍़यादती के खिलाफ और अपने हुकूक को हासिल करने लिए खडा़ करें। सबसे बडा़ जु़ल्‍म जो उम्‍मत के हक़ में हो रहा है वोह इसके अकीदे और मसलक के खिलाफ उस पर काफिराना क़वानीन का मुसल्‍लत होना है। उम्‍मत को इस पर इसरार करना चाहिए के निजातदहन्‍दा सिर्फ इस्‍लाम है और ये के वोह मुसल्‍लत सेक्‍यूलर निज़ामो को मुस्‍तरद कर सकती है। बहुत से लोग ये समझते है के सिर्फ एक इस्‍लामी दस्‍तूर के निफाज़ से इस्‍लामी निज़ाम कायम हो जाएगा। ये तसव्‍वुर सिर्फ एक ख्‍वाब व खयाल है और मनहजे नबवी से इन्‍हेराफ (किनारा करना ) है। पैग़म्‍बर (صلى الله عليه وسلم) ने मआशरे से राब्‍ता रखा ताकि समाज को इस्‍लामी सियासत और रूझानात के मुताबिक ऐसे ढाल दे, जो अल्‍लाह की मर्जी़ हो वोह उनकी मर्जी़ हो और जो अल्‍लाह की नापसन्‍दगी हो वोह उनकी नापसन्‍द हो जाए और इस्‍लामी रूझानात को मआशरे का ग़ालिब शउर बना दे ताके हर चीज़ को हलाल व हराम के पैमाने पर नापने लगे। जब मदीने में ये तसव्‍वुर (विचारधारा) हक़ीक़त में ढल गए तो वहां एक इस्‍लामी समाज वजूद में आ गया।

ख़िलाफत की वापसी क़रीब है : अहले ईमान को अल्‍लाह पर कामिल भरोसा और एतमाद होना चाहिए के अल्‍लाह की नुसरत जरूर हासिल होगी और ख़िलाफत जरूर क़ायम होगी। उसके क़याम के सिलसिले में पैग़म्‍बर (صلى الله عليه وسلم) ने खुशखबरी दी है। ईमाम अहमद से रिवायत है कि पैग़म्‍बर (صلى الله عليه وسلم) ने फरमाया :

تَكُونُ النُّبُوَّةُ فِيكُمْ مَا شَاءَ اللَّهُ أَنْ تَكُونَ ، ثُمَّ يَرْفَعُهَا تَبَارَكَ وَتَعَالَى إِذَا شَاءَ ، ثُمَّ تَكُونُ الْخِلاَفَةُ عَلَى مِنْهَاجِ النُّبُوَّةِ فَتَكُونُ مَا شَاءَ اللَّهُ أَنْ تَكُونَ ، ثُمَّ يَرْفَعُهَا إِذَا شَاءَ أَنْ يَرْفَعَهَا ، ثُمَّ يَكُونُ مُلْكًا عَاضًّا فَتَكُونُ مُلْكًا مَا شَاءَ اللَّهُ ، ثُمَّ يَرْفَعُهُ إِذَا شَاءَ أَنْ يَرْفَعَهُ مُلْكًا جَبْرِيَّةً ، ثُمَّ تَكُونُ خِلاَفَةٌ عَلَى مِنْهَاجِ النُّبُوَّةِ ، ثُمَّ سَكَتَ

''तुम्‍हारे दरमियान नबूवत होगी जब तक अल्‍लाह चाहेगा। और फिर जब अल्‍लाह उसे उठाना चाहेगा उठा लेगा। फिर ख़िलाफत अला मिन हाजुल नबुव्‍वत होगी जब तक अल्‍लाह चाहेगा फिर जब अल्‍लाह चाहेगा उसे उठा लेगा। फिर काट खाने वाली बादशाहत होगी जब तक अल्‍लाह चाहेगा फिर जब अल्‍लाह चाहेगा उसे उठा लेगा। फिर जब्र व कहर की बादशाहत होगी जब तक अल्‍लाह चाहेगा। उसके बाद दोबारा से ख़िलाफत नबुव्वत के तरीक़े से क़ायम होगी।“ 
   
ये हदीस पैग़म्‍बराना आयतों में से एक है क्‍योंकि मुस्‍तक़बिल (भविष्य) की खबर देती है। बयानकर्दा वाक़ियात के सिलसिले में अक्‍सर की ताईद और तस्‍दीक हो चुकी है। नबुव्‍वत, ख़िलाफत अला मिन हाजुल नबुव्‍वत, काट खाने वाली बादशाहत और जब्र की बादशाहत वाक़े हो चुकी है। अब सिर्फ आखरी टुकडा़ यानी दोबारा ख़िलाफत आला मिन हाजुल नबुव्‍वत का बहाल होना बाकी है। एक दूसरी हदीस में नबी (صلى الله عليه وسلم) ने ये बयान फरमाया के ख़िलाफत की हदूद कितनी वसीह होगी और इसके क्‍या-क्‍या नताईज होंगे। ईमाम अहमद और अल दारमी ने अबू कबील के तरीक से बयान किया के : हम अब्‍दुल्‍लाह बिन अमरू बिन आस رضي الله عنه के पास थे तो पूछा गया के कौनसा शहर पहले फतह होगा कुसतुनतुनिया या रोम? तब अब्‍दुल्‍लाह ने अपना एक पुराना सन्‍दूक मंगवाया, उसमें से एक तहरीर निकाली फिर कहा : जब हम रसूलुल्‍लाह (صلى الله عليه وسلم) के चारो तरफ बैठे लिख रहे थे तो आप (صلى الله عليه وسلم) से पूछा गया के कौनसा शहर पहले फतह होगा कुसतुनतुनिया या रोम? तो आप (صلى الله عليه وسلم) ने फरमाया हरकिल का शहर पहले फतह होगा यानी कुसतुनतुनिया।'' ये हदीस बताती है के मुसलमान ईटली का पायाऐ तख्‍त (राजधानी) रोम फतह करेंगे जो पोप का सदरे मकाम और ईसाइयत का मरकज़ (केन्द्र) है और ख़िलाफत वापस होगी और बाकी रहेगी।

अल्‍लाह की नुसरत : इस बारे में अल्‍लाह سبحانه وتعال फरमाता है :

يَـٰٓأَيُّہَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ إِن تَنصُرُواْ ٱللَّهَ يَنصُرۡكُمۡ وَيُثَبِّتۡ أَقۡدَامَكُمۡ

''ऐ ईमान वालो अगर तुम अल्‍लाह की मदद करोगे अल्‍लाह तुम्‍हारी मदद करेगा और तुम्‍हारे कदम जमा 
देगा।'' (तर्जुमा मआनी कुरआन-ए-हकीम, सूरह मोहम्‍मद -7) 

अल्‍लाह سبحانه وتعال ने अपनी फतह व नूसरत से उन लोगों को नवाज़ने का वादा किया जो इसके दीन की मदद करेंगे। फरमाया :

وَلَيَنصُرَنَّ ٱللَّهُ مَن يَنصُرُهُ
''अल्‍लाह अपने मददगारो की ज़रूर नुसरत फरमायेगा’’। (तर्जुमा मआनी कुरआन-ए-हकीम,अल हज्ज- 40)

बल्कि ईमान की मदद व नुसरत तो उसने अपने ऊपर ज़रूरी करारी दी है। फरमाया : 

وَكَانَ حَقًّا عَلَيۡنَا نَصۡرُ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ 
“हम पर मोमिनों की मदद करना लाज़िम है.” (तर्जुमा मआनी कुरआन-ए-हकीम,अल रोम -47)

फतह व नुसरत का वक्‍त अल्‍लाह سبحانه وتعال   ही को मालूम है लेकिन जब अल्‍लाह नुसरत चाहेगा वोह इसके हुसूल (प्राप्ति) के ज़राए और तरीके आसान फरमा देगा और ऐसे हमवार हालात पैदा कर देगा के उनसे अहले ईमान को नुसरत का ईल्‍म होगा। इसलिए हमें पुख्‍ता यक़ीन होना चाहिए के जितना ज्‍़यादा हम दीन की मदद व नुसरत करेंगे उतनी ही बडी़ और करीबतर अल्‍लाह की नुसरत हमारे लिए होगी। इस तरह अल्‍लाह की फतह और ईनाम के हुसूल के लिए हमें सिर्फ और सिर्फ उसी की ईताअत करनी चाहिए। इस बात पर बिना किसी शर्त के ईमान होना चाहिए के वही तन्हा मालिक, रब, खालिक और मारने जिलाने वाला है, ईज्‍़ज़त व जिल्‍लत उसी के हाथ में है, वही तन्हा फतह दे सकता है, वोह हर चीज़ पर कादिर है और ये के हममे से कोई भी नही मर सकता जब तक तक़दीर में जो खिला है उसे ना देख लें।

ऐ अहले! ईमान अल्‍लाह की पुकार पर लब्‍बेक कहो : सहाबा इकराम को अल्‍लाह की मदद व नुसरत इसलिए हासिल हुई के उन्‍होने अल्‍लाह की पुकार पर लब्‍बेक कहा। अपने इख्‍लास का मुज़ाहिरा किया, अपनी सरवत और अपनी ज़िन्दगीयां अल्‍लाह के कलमें को बुलन्‍द करने के लिए लगा दी। अल्‍लाह के रसूल (صلى الله عليه وسلم) के साथ मिलकर उन्‍होंने जाहिलियत के मलबे और कुफ्र की सरज़मीन में पहली और खालिस इस्‍लामी रियासत क़ायम कर दी। आज भी मुसलमान कौम को उन अहले ईमान की ज़रूरत है जो अल्‍लाह की पुकार पर लब्‍बेक कहें और उम्‍मते मुस्लिमा को इस्‍लाम की हाकिमियत की बहाली की जद्दोजहद में लगा दे। इस काम के लिए ज़रूरी है के मुसलमानों को अपने फराईज़ का अहसास हो जिससे नज़रअन्‍दाज करने पर वोह अल्‍लाह के गज़ब व गैज़ का मुस्‍तहिक बन रहे हैं। उन्हें अल्‍लाह की किताब और सुन्‍नत की पाबन्‍दी का अहसास दिलाया जाए। फिर सबसे बड़कर इकामते ख़िलाफत को जो मतलूब है वोह ये के अहले ईमान पूरी उम्‍मत के अन्‍दर इस्‍लामी अहसास व शउर पैदा करे जैसाकि सिरते रसूलुल्लाह (صلى الله عليه وسلم) का तकाजा़ है। वोह अहसासे जिम्‍मेदारी जो मोमिन को उम्‍मत से राब्‍ता करने पर मजबूर कर दे ताके उम्‍मत का इस्‍लाम पर एतमाद (भरोसा) फिर से क़ायम हो उस हद तक के इस्‍लाम के अलावा उन्‍हे कोई मुताबादिल (विकल्‍प) नज़र ना आए। दुकानों, यूनिवर्सिटीयों और मस्जिदो में हर जगह लोगों से मिला जाए और उनके अन्‍दर अल्‍लाह पर एतमाद और यक़ीन बहाल किया जाए और उम्‍मत को इस काबिल बना दिया जाए के वोह जाबिर हुक्‍मरानो के सामने खडे हो जाए, गै़र- इस्‍लामी हुकूमतों को मुस्लिम देशों से जड से उखाड़ फैकने, खौफ व दहशत का लबादा उतार फैके जो जाबिर तानाशाहो ने उसके ऊपर मुसल्‍लत कर रखी है। उसी वक्‍त उम्‍मत खडी़ होगी और गै़र-इस्‍लामी हुकूमतो की जगह ख़िलाफत क़ायम करेगी। तमाम मुसलमानो को एक रियासत में मुत्‍तहिद करके और एक लडी़ में पिरोकर खिलाफते इस्‍लामी रियासत को एक पावर में तब्‍दील कर देगी। अल्‍लाह سبحانه وتعال    ने फरमाया :

يَـٰٓأَيُّہَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ ٱسۡتَجِيبُواْ لِلَّهِ وَلِلرَّسُولِ إِذَا دَعَاكُمۡ لِمَا يُحۡيِيڪُمۡۖ

''ऐ ईमान वालो अल्‍लाह और उसके रसूल की पुकार पर लब्‍बेक कहो जब तुम्‍हे हयातबख्‍्श चीज़ की तरफ बुलाये”। (तर्जुमा मआनी कुरआन-ए-हकीम, अनफाल -24)

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