अख़्लाक़े हसना(3) : ख़ैर के अ़लावा हर बात में ख़ामोशी,ईफ़ाऐ अ़हद , अल्लाह की ख़ातिर गुस्सा करनाःमुमिनीन से हुस्ने ज़न रखनाः

7 ख़ैर के अ़लावा हर बात में ख़ामोशीः


बुख़ारी और मुस्लिम शरीफ़ में हज़रत अबू हुरैराह (رضي الله عنه) से मरवी है के नबी अकरम (صلى الله عليه وسلم) ने फ़रमायाः

((من کان یؤمن باللّٰہ والیوم الآخر فلیقل خیراً أو یصمت))
जो कोई अल्लाह और यौमे आख़िरत पर ईमान रखता हो वो बात करे तो ख़ैर की, या फिर ख़ामोशी इख़्तियार करे।
मुसनद अहमद में हज़रत बरा बिन आज़िब  (رضي الله عنه) से रिवायत नक़ल है जिसे हैसमी ने बा ऐतेमादे सनद बताया है और इब्ने हिब्बान ने अपनी सही में शामिल किया है, नीज़ बैहक़ी की शअब में भी रिवायत हैः 

(( جاء أعرابی إلی رسول اللّٰہافقال:یا رسول اللّٰہ علمني عملاً یدخلني الجنۃ،قال:لئن کنت أقصرت الخطبۃ لقد أعرضت المسألۃ،أعتق النسمۃ،و فک الرقبۃ،فإن لم تطق ذٰلک فأطعم الجائع،وأسق الظمآن، وأمر بالمعروف وانہ عن المنکر،فإن لم تطق ذٰلک فکف لسانک إلاعن الخیر))

एक बद्दू रसूले अकरम (صلى الله عليه وسلم) के पास आया और कहने लगाः ऐ अल्लाह के रसूल (صلى الله عليه وسلم) मुझे ऐसा अ़मल बताइए जो मुझे जन्नत में दाख़िल कर दे। आप (صلى الله عليه وسلم) ने फ़रमायाः लौंडियों को आज़ाद करो, ग़ुलाम को आज़ाद करो, अगर उसकी ताक़त ना हो तो भूखों को खाना खिलाओ और प्यासों को पानी पिलाओ, मारूफ़ का हुक्म दो और बदी से रोको, अगर उसकी भी इस्तिताअ़त ना हो तो अपनी ज़बान को बंद रखो मगर ये के कोई नेक बात हो (कहना हो)।

तिबरानी में हज़रत सौबान (رضي الله عنه) से रिवायत है जिसे उन्होंने हसन बताया है के रसूले अकरम (صلى الله عليه وسلم) ने फ़रमायाः

((طوبی لمن ملک لسانہ ووسعہ بیتہ وبکی علی خطیئتہ))
ख़ुशख़बरी है उसके लिए जिस ने अपनी ज़बान को क़ाबू में रखा, जिस का घर उसके लिए काफ़ी था और जो अपनी ख़ताओं पर आँसू बहाता था।

इमाम मालिक तिरमिज़ी, नसाई, इब्ने माजा, इब्ने हिब्बान और मुस्तदरक में हज़रत बिलाल बिन हारिस अलमुज़्नी (رضي الله عنه) से हदीस मनकूल है जिसे हसन सही बताया है के रसूले अकरम (صلى الله عليه وسلم) ने फ़रमायाः

(( إن الرجل لیتکلم بکلمۃ من رضوان اللّٰہ، ما کان یظن أن تبلغ ما بلغت،یکتب اللّٰہ تعالیٰ لہ بھا رضوانہ إلی یوم یلقاہ۔وإن الرجل لیتکلم بکلمۃ من سخط اللّٰہ،ماکان یظن أن تبلغ ما بلغت،یکتب اللّٰہ لہ بھا سخطہ إلی یوم یلقاہ۔))

एक शख़्स एैसी बात कहता है जो अल्लाह سبحانه وتعالیٰ को पसंद होती है और उसे ये मालूम नहीं होता के वो कहाँ तक पहुंची, लेकिन अल्लाह उस शख़्स के लिए जब वो अपने रब से मिलेगा, अपनी रज़ा लिख देता है। एक शख़्स एैसी बात कहता है जो अल्लाह سبحانه وتعالیٰ को नापसंद होती है और उसे ये मालूम नहीं होता के वो कहाँ तक पहुंची, लेकिन अल्लाह उस शख़्स के लिए जब वो अपने रब से मिलेगा, अपनी नाराज़ी और ग़ुस्सा लिख देता है।

मुसनद अहमद और तिरमिज़ी ने हज़रत मआज़ बिन जबल (رضي الله عنه) से रिवायत किया है और उसे हसन सही बताया है, नीज़ नसाई, इब्ने माजा, इब्ने हिब्बान और हाकिम ने रिवायत की है और सही बताया है जिससे अ़ल्लामा ज़ेहबी ने इत्तिफाक़ कियाः

((کنت مع النبیا فی سفر فأصبحت یوماً قریباً منہ ونحن نسیر،فقلت یا رسول اللّٰہ أخبرني بعمل یدخلني الجنّۃ و یباعدني من النار۔۔۔ ثم قال ألا أخبرک بملاک ذٰلک کلہ؟ قلت بلی یا رسول اللّٰہ،قال:کف علیک ھذا،و أشار إلی لسانہ،قلت، یا نبي اللّٰہ وإنا لمؤاخذون بما نتکلم بہ؟ قال: ثکلتک أمک،وھل یکب الناس في النار علی وجوھھم،أو قال علی مناخرھم،إلا حصائد ألسنتھم))

एक सफ़र में मैं रसूले अकरम के साथ था, मैं एक दिन उनसे क़रीब हुआ और हम चल रहे थे, तो मैंने अ़र्ज़ कियाः या रसूलुल्लाह (صلى الله عليه وسلم) ऐसा अ़मल बताईए जो मुझे जन्नत में दाख़िल कर दे और जहन्नुम से दूर रखे। आप ने फ़रमायाः क्या मैं तुम्हें वो ही ना बता दूं जो इन सब की असल जड़ या बुनियाद है? तो मैंने कहाः क्यों नहीं, या रसूलुल्लाह (صلى الله عليه وسلم), आप ने अपनी ज़बाने मुबारक की तरफ़ इशारा करते हुए फ़रमायाः इसको क़ाबू में रखो। मैंने कहाः ऐ अल्लाह के नबी क्या हम जो बात कहते हैं इस पर भी हमारा मुआख़िज़ा होगा? आप ने फ़रमायाः तुम्हारी माँ तुम्हें खो दे! और क्या लोग यूं ही अपने चेहरों के बल जहन्नुम में डाले जाऐंगे या फ़रमाया के अपनी नाकों के बल डाले जाऐेंगे।

8 ईफ़ाऐ अ़हद :

अल्लाह سبحانه وتعالیٰ का इरशाद हैः

يٰۤاَيُّهَا الَّذِيْنَ اٰمَنُوْۤا اَوْفُوْا بِالْعُقُوْدِ١ؕ۬
ऐ ईमान वालो! अहद-ओ-पैमाँ पूरे करो। (तर्जुमा मआनिये क़ुरआने अ़ज़ीम: अल माइदा- 1)
और फ़रमाता हैः

وَ اَوْفُوْا بِالْعَهْدِ١ۚ اِنَّ الْعَهْدَ كَانَ مَسْـُٔوْلًا
और वादे पूरे करो क्योंकि क़ौल-ओ-क़रार की बाज़पुर्स होने वाली है। (तर्जुमा मआनीये क़ुरआने करीमः बनीइसराईल- 34)

9 अल्लाह की ख़ातिर गुस्सा करनाः


बुख़ारी और मुस्लिम शरीफ़ में हज़रत अ़ली बिन अबी तालिब (رضي الله عنه) से रिवायत है के रसूले अकरम (صلى الله عليه وسلم) ने मुझे एक रेशमी जोड़ा इनायत किया। मैं उसको पहन कर आया तो आप के चेहराऐ पुरनूर पर ग़ुस्सा देखा। तो मैंने उसको फाड़ कर अपने घर की औरतों के दरमियान तक़सीम कर दिया। (मुत्तफिक़ अ़लैह)

बुख़ारी और मुस्लिम शरीफ़ में अबू मसऊ़द उ़क़बा बिन अ़म्र अलबदरी  (رضي الله عنه) से रिवायत हैः

(جاء رجل إلی النبيا فقال: إني لأتأخر عن صلاۃ الصبح من أجل فلان مما یطیل بنا،فما رأیت رسول اللّٰہ ا غضب في موعظۃ قط أشد مما غضب یومءِذٍ، فقال: یا أیھا الناس،إن منکم منفرین،فأیکم أمّ الناس فلیوجز،فإن من وراۂ الکبیر والضعیف وذا الحاجۃ)

एक शख़्स नबी अकरम के पास आया और कहाः फ़ुलाँ की वजह से नमाज़े फ़ज्र में मुझे बहुत देर हो जाती है क्योंकि वो बहुत लंबी नमाज़ पढ़ाते हैं। इस बात से रसूलुल्लाह (صلى الله عليه وسلم)  इतने ख़फ़ा हुए के इस से पहले इतने ग़ुस्से में नहीं देखा था। फिर फ़रमायाः ऐ लोगो! तुम में कुछ लोग दूसरों को बदज़न करते हैं, लिहाज़ा तुम में जो इमामत करें, वो इस में तूल ना करें क्योंकि इन (इमामों) के पीछे बूढ़े, कमज़ोर और ज़रूरतमंद लोग होते हैं।

बुख़ारी और मुस्लिम शरीफ़ में हज़रत आईशा (رضي الله عنها) से रिवायत नक़ल हैः

(قدم رسول اللّٰہ ا من سفر و قد سترت سھوۃ لي بقرام فیہ تماثیل، فلما رآہ رسول اللّٰہ ا ھتکہ وتلون وجھہ وقال:یا عائشۃ،أشد الناس عذاباً عند اللّٰہ یوم القیامۃ الذین یضاھون بخلق اللّٰہ)

हुज़ूरे अकरम (صلى الله عليه وسلم) सफ़र से वापिस तशरीफ़ लाए, मैंने एक खाने पर बारीक पर्दा डाल दिया था जिस पर तस्वीरें बनी हुईं थीं। आप ने जब ये देखा तो उसे फाड़ डाला और आप के चेहराऐ मुबारक का रंग बदल गया फिर फ़रमायाः ऐ आईशा! क़यामत के दिन सब से शदीद अ़ज़ाब में वो लोग होंगे जो अल्लाह سبحانه وتعالیٰ की तख़लीक़ की नक़ल किया करते हैं। 

 

10 मुमिनीन से हुस्ने ज़न रखनाः


अल्लाह سبحانه وتعالیٰ का इरशाद हैः

لَوْ لَاۤ اِذْ سَمِعْتُمُوْهُ ظَنَّ الْمُؤْمِنُوْنَ وَ الْمُؤْمِنٰتُ بِاَنْفُسِهِمْ خَيْرًا١ۙ
इसे सुनते ही मोमिन मर्दों और औरतों ने अपने हक़ में नेक गुमानी क्यों ना की, (तर्जुमा मआनिये क़ुरआने करीम : अल-नूर- 12)

 

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