अल्लाह के रसूल (صلى الله عليه وسلم) की नबुव्वत का आग़ाज़ - 1
जब अल्लाह के रसूल सल्ल0 अल्लाह की तरफ़ से तमाम इंसानियत के लिये इस्लाम का पैग़ाम लेकर आये तो सबसे पहले आप सल्ला0 ने अपनी ज़ौजा हज़रत ख़दीजतुल-कुबरा (रज़ि0) को दावत दी और वोह ईमान लाईं फिर आप सल्ला0 ने अपने चचा ज़ाद भाई हज़रत अ़ली इब्ने अबी तालिब रज़ि0 को इस्लाम की दावत दी और वोह ईमान ले आये, फिर अपने ग़ुलाम हज़रत ज़ैद रज़ि0 को दावत दी और उन्होंने क़ुबूल की, और इसके बाद आप (صلى الله عليه وسلم) ने अपने रफ़ीक़ और दोस्त हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ि0 को दावत दी जो उन्होंने भी क़ुबूल की, इसके बाद आप (صلى الله عليه وسلم) ने और लोगों को दावते इस्लाम की तरफ़ बुलाया, बाज़ ने क़ुबूल किया और बाज़ ने इन्कार।
जब हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ि0 ईमान लाये तो उन्होंने अपने ईमान लाने की ख़बर उन लोगों दी जिन पर उन्हें एैतेबार था, हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ि0 का अपने लोगों में मोअ़तबर मुक़ाम था और लोग उनका साथ पसंद करते थे और अपने मुआमिलात में उन से मश्वरा भी करते थे, उनके ज़िरये हज़रत उ़स्मान बिन अफ़्फान, हज़रत ज़ुबैर बिन अल-अ़वाम, हज़रत अ़ब्दुल रहमान इब्ने अ़ौफ़, हज़रत सअ़द इब्ने अबी वक़्क़ास और हज़रत तलहा इब्ने उ़बैदुल्लाह रज़ि0 मुश्र्रफ़ ब इस्लाम हुये, फिर रसूलुल्लाह सल्ल0 के पास आये, ईमान क़ुबूल किया और इ़बादत कीं, फिर हज़रत आमिर इब्नुल-जर्राह (अबू उबैदा) रज़ि0 ने इस्लाम क़ुबूल किया फिर हज़रत अ़बदुल्लाह इब्ने अ़ब्दुल असद (अबू सलमा), अल-अरक़म बिन अबिल-अरक़म, उ़स्मान इब्ने मज़ऊ़न रज़ि0 वग़ैरह इस्लाम में दाखि़ल हुये और फिर लोग दाखि़ल होते रहे यहाँ तक के मक्का में हर जगह इस्लाम के चर्चे आम हो गये और यह क़ुरैश के दरमियान गुफ़्तगू का मौज़्ाू बन गया।
हुज़ूर अक्रम सल्ल0 दावत के इस इ़ब्तिदाअ़ी दौर में लोगों के घर जाते और उन्हें बताते के उनके लिये अल्लाह के क्या अह्काम हैं, वही अल्लाह इ़बादत के लायक़ है और यह के इ़बादत में किसी और को शरीक न करें फिर आप (صلى الله عليه وسلم) ने अल्लाह के उस हुक्म की तामील में खुले तौर पर अह्ले मक्का को अल्लाह के दीन की दावत दीः
يٰۤاَيُّهَا الۡمُدَّثِّرُۙ ﴿۱﴾
एै औढ़ने वाले लपेटने वाले (तर्जुमा मआनी क़ुरआन करीम सूरहः मुदस्सिरः आयत 1)
उस वक़्त तक आप (صلى الله عليه وسلم) लोगों से ख़ुफ़ि़या तौर से मिलते थे उन्हें दीन की दावत देते और इस्लाम पर जमा करते थे, आप (صلى الله عليه وسلم) के अस्हाबे किराम रज़ि0 मक्का के बाहर पहाड़यों में छुप कर नमाज़ पढ़ा करते थे, जब कोई शख़्स ईमान में दाख़िल होता तो आप (صلى الله عليه وسلم) उस शख़्स को किसी और सहाबी के पास भेज देते ताके वोह अपने नये साथी को क़ुरआन सिखाये, इसी तरह आप (صلى الله عليه وسلم) ने हज़रत ख़ब्बाब बिन अल-अरत को मुक़र्रर किया था के वोह हज़रत ज़ैनब बिन्त अल-ख़त्ताब रज़ि0 और उनके शौहर हज़रत सईद रज़ि0 को क़ुरआन सिखायें हज़रत उ़मर रज़ि0 इसी हल्क़े में इस्लाम में दाखि़ल हुये, हज़रत उमर रज़ि0 के वहाँ पहुँचने से आप की बहन और बहनोई को बहुत हैरत हुई थी और फिर हुज़ूर अक्रम सल्ल0 ने मेह्सूस किया के यह तरीक़ा काफ़ी नहीं है चुनाँचे आप (صلى الله عليه وسلم) ने हज़रत अर्क़म रज़ि0 के घर को इस नईं तालीम का मरकज़ बनाया, इसी जगह से मुसलमानों को सिखाया जाने लगा इस्लाम की तालीम दी जाने लगी और क़ुरआन की समझते हुये तिलावत की तरग़ीब दी जाने लगी, जब कोई हलक़ा बगोश इस्लाम होता तो उसे इसी दारुल-अर्क़म भेज देते, तीन साल तक यही सिलसिला चला, मुसलमानों के हलक़ों को इस्लाम सिखाना, उन्हें नमाजें़ पढ़ाना, रातों को तहज्जुद पढ़ाना, नमाज़ और तिलावत के ज़रिये रूहानियत को तक़्िवयत देना, उनके अन्दर अल्लाह के आयात की फ़िक्र ए कामिल और अल्लाह की मख़्लूक़ात का तदब्बुर बेदार करना, उनमें क़ुरआन के अलफ़ाज़ ओ मआनी का फे़हम पैदा करना, उनको इस्लामी अफ़्कार में ढालना, मुसीबत के वक़्त सब्र की तर्बियत देना, आप (صلى الله عليه وسلم) ने तर्बियत दी के मुसीबतों में सब्र करना अल्लाह की इताअ़त है यही अहवाल उस वक़्त तक रहे यहाँ तक के अल्लाह तआला का हुक्म आयाः
فَاصۡدَعۡ بِمَا تُؤۡمَرُ وَ اَعۡرِضۡ عَنِ الۡمُشۡرِڪِيۡنَ ﴿۹۴﴾
पस तुम्हें जिस चीज़ का हुकम मिला है उसे वाशिगाफ़ बयान करदो और मुषिरकीन से एराज़ करो।
(तर्जुमा मआनी कुऱ्आन करीमः सूरहः हिज्रः आयतः 94)
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