खिलाफते राशिदा सानी (IInd) पर 100 सवाल (15-16)

➡  सवाल नं. (15) क्या खलीफा की कार्यअवधि (term of office) सीमित होगी, जैसे लोकतंत्र में पांच साल के लिए होती हैं? इस मामलें में क्या हुक्म हैं?

 

 ✅इस्लाम नें खलीफा की कार्यअवधि निर्धारित नहीं की हैं। खिलाफत में ''मेंहकमतुल मज़ालिम'' नाम की अदालत बिना किसी दबाव के उस वक़्त खलीफा और हुक्मरानों को बर्खास्त करनें का अधिकार रखती हैं जब

✅ खलीफा और दीग़र हुक्मरान किसी भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जाये

✅या वोह इस्लामी संविधान और क़ानून के अलावा कोई दूसरा क़ानून लागू करें या खलीफा, खलीफा बनें रहनें कि सात शर्तो पर न बनें रहें (जो ऊपर ज़िक्र कि गई) मसलन पाग़ल या मुर्तद हो जाए। 

✳जहाँ तक बैअत की बात हैं, बैअत हुक्मरान और जनता के बीच एक मुआहिदा (Contract/सन्धी) हैं, जिसमें हुक्मरान शरीअत लागू करनें और जनता सहयोग देनें और इताअत करनें का वादा करते हैं। इस वादे (Contract) कि अविध तय नहीं होती। जब तक वोह ठीक से काम करते रहे तब तक वोह हुक्मरानी में रह सकते हैं।

✅खलीफा पर समय की कोई पाबन्दी नहीं होती हैं, खलीफा के पास पूरा मौका होता हैं कि वो बहुत लम्बे समय की योजना बनाकर चले।

❌लोकतंत्र की कई बड़ी कमज़ोरियों में सें एक बड़ी कमज़ोरी यह भी हैं कि हुक्मरानों कि कार्य अवधि पांच साल कि होती है इस तरह हर पांच साल में हुक्मरॉ बदल जाता हैं। सरकार बडी़ मेंहनत से योजनाऐं बनाती हैं और अभी इन योजनाओं को ठीक से लागू भी नहीं किया जाता की अचानक नये लोग आ जाते हैं, जो या तो उन योजनाओं को बन्द कर देते हैं या उन्हे लटका हुआ छोड़ देते हैं। यदि किसी संस्था का हर दो-चार साल में लीडर या व्यवस्थापक बदलता रहे तो वह संस्था कभी कामयाब नहीं हो सकती।

❌इसीलिए आज की लोकतांत्रिक शिक्षा पद्धती पर आधारित दसवी कक्षा की सामाजिक विज्ञान की किताब ''डेमोक्रेटिक पॉलिटीक्स'' में तानाशाही (Dictator) दूसरी तरफ लोकतंत्र (Democracy) में प्रगति और उपलब्धियों के ताल्लुक़ से तुलना की गई हैं। इसमें बताया गया कि डिक्टेटरशिप (तानाशाही) की प्रगति लोकतंत्र (Democracy) से अर्थव्यवस्था, ग़रीबी और दूसरी कई समस्याओं के ताल्लुक़ से दो से तीन गुना ज़्यादा बेहतर हैं और इसके लिए उन्होंनें यह कारण लिखा हैं कि लोकतंत्र में सरकार बार-बार बदलती हैं जिसके कारण वो जनता के फायदे के लिए जो योजना बनाते हैं, उस पर ध्यान केन्द्रित नहीं कर पाते। तानाशाही में एक व्यक्ति को फैसले लेनें का पूरा अधिकार होता हैं इसलिए उसके लिये कोई असमंजस्व और कनफ्यूज़न की स्थिति पैदा नहीं होती हैं।

❌लोकतंत्र में 20 लोग 20 तरह की योजना और सुझाव लाते हैं। कोई योजना या क़ानून पर तब तक फैसला नहीं होगा जब तक कि वोह सभी लोगों तक नहीं पहुचेगा और अक्सरियत की राय न ले ली जाये।

❌एक क़ानून मंजूर करनें में बहुत लम्बा समय लग जाता हैं। इसीलिए लोकतंत्र में अक्सर क़ानून बननें, मंजूर होनें और लागू होनें में अक्सर कई दशक लग जातें हैं।

✅ खिलाफत में खलीफा के सरकार में रहनें के लिये समय की कोई पाबंदी नहीं होती हैं ताकि वो लम्बी कार्य योजना बना सकें।

❌सरकार की निर्धारित समय अवधी होनें का दूसरा नुक्सान यह भी हैं कि जब सरकारे बार-बार बदलती हैं तो किसी पार्टी को हुकूमत पानें के लिए कई हथकंडे़ अपनानें पड़ते हैं। वो पार्टी प्रचार के लिए कॉरपोरेट ग्रुप (बडी पूंजीवदी कम्पनियों) से बहुत बडी़ रक़में लेती हैं ताकि पैसा खर्च करके लोगों का ध्यान किसी भी तरह से अपनें ओर आकर्षित कर सकें और सत्ता में आ जाये। कॉरपोरेट ग्रुप उन्हे इसलिए पैसा देते हैं कि जैसे ही वो पार्टी सत्ता में आयेगी उसके बाद वो उनको खूब रियायतें देगी और उनको फायदा पहुंचानें के लिये नये क़ानून बनवाऐगी और दूसरे क़ानूनों को उनके मुवाफिक़ बनायेगी। इसीलिए इस व्यवस्था को पूंजीवाद या पूंजीवादी व्यवस्था कहा जाता हैं।

❌इससे एक और बडा़ बिगाड़ पैदा होता हैं कि जब वो पार्टिया जीत जाती हैं तो वो लम्बे समय तक उन्हीं की खिदमत करती हैं।

✅ यह सब चीज़ें खिलाफत में नहीं होगी, क्योंकि खिलाफत में जल्दी–जल्दी हुकूमत नहीं बदलेगी। यदि कोई खलीफा सही तरीके से हुकूमत कर रहा हैं तो वो आजीवन खलीफा बना रह सकता हैं। यदि कोई खलीफा इस्लाम को सही तरीके से लागू करता हुआ नहीं पाया जाता तो उसे उसे बर्खास्त कर दिया जाता हैं।


🌙🌙खिलाफते राशिदा सानी (IInd) पर 100 सवाल🌙🌙


➡ सवाल नं. (16) खिलाफत का ढांचा कैसा होगा ?


✳ खिलाफत हुक्मरानी (शासन चलानें) की इस्लामी शरई क़ानून पर आधारित एक मुम्ताज़ और अनोखी व्यवस्था हैं। खिलाफत के सभी अहकाम, अल्लाह के नबी (صلى الله عليه وسلم)और उनके बाद सहाबा (رضی اللہ عنھم) की ज़िन्दगी से लिये गये हैं।

✅ राज्य का प्रधान खलीफा होगा।

✅ उसके बाद उसके दो सलाहकार जिन्हें मआविनें तन्फीज़ (Executive Assistant) और मआविनें तफवीज़ (Delegated Assistant) कहते हैं।

✅ मआविनें तफवीज़ खलीफा का मददगार होता हैं, जिसे खलीफा पावर ऑफ अटर्नी मुन्तकिल (ट्रांसफर) कर सकता हैं, बहुत बडी़ रियासत होनें कि वजह सें खिलाफत में कई ज़िम्मेदारियाँ होती हैं। खलीफा जिस पर सबसें ज़्यादा भरोसा करता हैं उसें वोह किसी खास क्षेत्र के मामले में अपना प्रतिनिधि नियुक्त कर सकता हैं, मआविन इस मसले पर खलीफा की पोलिसी के अनुसार फैसला करता हैं और वो फैसला खलीफा का फैसला माना जाता हैं।

✅ मआविनें तनफीज़ (Executive Assistant) का काम खलीफा कि तय कि हुई पालिसीयों को लागू करनें का होता हैं।

✅ इसके बाद ''वाली'' होगें जिन्हें गवर्नर (Governor) कहते हैं।

✅ इसके बाद आर्मी चीफ (Army Chief), जिसे अमीरे जिहाद कहते हैं।

✅ हुकूमत में अन्दरूनी शांती बनाये रखनें के लिये डिपार्टमेंट ऑफ इंटरनल सिक्यूरिटी (Department Of Internal Security) यानी सुरक्षा विभाग होता हैं, जिसके अधीन पुलिस वगैराह आती हैं।

✅ विदेश निती से सम्बन्धित मामलात को देखनें के लिये विदेश निती का विभाग (Department Of Foreign Fffairs) हैं।

✅ उद्धयोगधंधों सें संबधित डिपार्टमेंट ऑफ इण्डस्ट्री (Department Of Industry) होता हैं।

✅ क़ानून व्यवस्था की निगरानी के लिये अदालती (Judiciary) व्यवस्था होगी।

✅ डिपार्टमेंट ऑफ पिपल्स अफेयर्स (Department Of People’s Affairs) जो लोगों की मामलात की देख रेख करेगी, जिसमें प्रशासनिक अधिकारी होते हैं।

✅ फंड्स की व्यवस्था के लिये स्टेट ट्रेज़री (State Treasury) यानी खज़ाना, जिसे बेतुलमाल कहते हैं, यह सिर्फ खलीफा के अधीन होता हैं।

✅ डिपार्टमेंट ऑफ इंर्फोमेंशन (Department Of Information) यानी मीडिया डिपार्टमेंट।

✅ उम्मा कौंसिल (Ummah’s Council), जो उम्मत की मजलिसे शूरा होगी। जिसमें रियासत के बाशिन्दे मुस्लिम और गै़र-मुस्लिमों के नुमाईन्दे होगें। जो खलीफा को मश्वरा देनें के लिए रहेगें। उम्मत के नुमाइंदे जो अलग-अलग इलाक़ो से ज़िम्मेदार के तौर पर जीत कर आयेगें, उनका काम अपनें ईलाक़े की तरक्की और उससे सम्बन्धित समस्याओं के बारे में खलीफा को मश्वरा देंना रहेगा। यह तेराह संस्थाए खिलाफत में मौजूद होगी जिसकी मदद से हुक्मरानी की जायेगी।.
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