ख़लीफ़ा कौऩ बन सकता है?

ख़लीफ़ा वो शख़्स है जो हुकूमत (शासन) और इख्तियार (authority) और अहकाम-ए-शरीयत के निफाज़ में उम्मत की नुमाइंदगी (प्रतिनिधित्व) करता है। इस्लाम ने हुक्मरानी और अथार्टी उम्मत को सौंपी है। ये उम्मत ही है जो किसी शख़्स को मुक़र्रर (नियुक्त) करती है ताकि वो हुकूमत और अथार्टी को उम्मत के नुमाइंदे की हैसियत से चलाए। और अल्लाह (سبحانه وتعال) ने उम्मत पर फ़र्ज़ किया है कि वो शरीयत के तमाम अहकामात (commands/orders) को नाफ़िज़ करे।


चूँकि मुसलमान ख़लीफ़ा का तक़र्रुर  (नियुक्त) करते हैं लिहाज़ा वो हुकूमत व इख्तियार और अहकामात-ए-शरीयत के निफाज़ में उम्मत का नुमाइंदा होता है। लिहाज़ा वो उस वक़्त तक ख़लीफ़ा नहीं हो सकता जब तक कि उम्मत उसे बैअत (pledge of alligence/वफादारी की शपत) ना दे। उम्मत ख़लीफ़ा की बैअत के ज़रीये इसे अमली तौर पर अपना नुमाइंदा मुक़र्रर करती है। इस बैअत के ज़रीये उस की ख़िलाफ़त का इनेक़ाद होता है चुनांचे उम्मत के ज़रीये ख़लीफ़ा को इख्तियार हासिल होता है और उम्मत पर ख़लीफ़ा की इताअत वाजिब होती है।


हुक्मरान उस वक़्त तक ख़लीफ़ा नहीं होता जब तक कि उम्मत में से अहले हल व अक़्द (उम्मत के प्रभावशाली लोग) अपनी मर्ज़ी और रजामंदी के साथ उसे बैअत ना दें। इस के लिए लाज़िम है कि वो ख़िलाफ़त के अक़्द (contract/सन्धि) की सभी शर्तों को पूरा करता हो और वो ख़िलाफ़त के स्थापित होने के बाद अहकामात-ए-शरीयत को नाफ़िज़ (लागू) करे। जहां तक ख़लीफ़ा के लिए लक़ब इख्तियार करने का ताल्लुक़ है, तो उसे ख़लीफ़ा या इमाम या अमीरुल मोमनीन कहा जा सकता है। ये अलक़ाबात (Titles) मुस्तनद अहादीस और इजमा सहाबा में बयान किए गए हैं। खुलफाऐ राशिदीन ने ये अलक़ाबात इख्तियार किए। मुस्लिम ने अबू सईद ख़ुदरी से रिवायत किया कि रसूलुल्लाह صلى الله عليه وسلم ने फ़रमाया:


))إذا بویع لخلیفتین فاقتلوا الآخرمنھما((
"जब दो खल़िफ़ा की बैअत की जाये तो इन में से दूसरे को क़त्ल कर दो”.

और मुस्लिम ने अब्दुल्लाह बिन अमरो बिन आस से रिवायत किया कि उन्होंने रसूलुल्लाह صلى الله عليه وسلم को ये फ़रमाते हुए सुना:

((ومن بایع إماماً فأعطاہ صفقۃ یدہ، وثمرۃ قلبہ فلیطعہ))


“और जो शख़्स किसी इमाम (ख़लीफ़ा) की बैअत करे तो उसे अपने हाथ का मुआमला और दिल का फल दे दे , फिर उसे चाहिए कि वो अपनी इस्तिताअत (क्षमता) के मुताबिक़ उस की इताअत भी करे”.


और मुस्लिम ने औफ़ बिन मालिक (رضي الله عنه) रिवायत किया कि रसूलुल्लाह صلى الله عليه وسلم ने इरशाद फ़रमाया:


))خیارأئمتکم الذین تحبونھم ویحبونکم وتصلون علیھم ویصلّون علیکم((

तुम्हारे बेहतरीन इमाम वो हैं जिन से तुम मुहब्बत करो और वो तुम से मुहब्बत करें। वो तुम्हारे 
लिए दुआएं करें और तुम उन के लिए दुआएं करो”.


जहां तक अमीरुल मोमनीन के लक़ब का ताल्लुक़ है, तो सब से पहले उमर बिन खत्ताब को इस लक़ब से पुकारा गया। इस के बाद सहाबा (رضی اللہ عنھم  ) के दौर में ये लक़ब जारी रहा। इन तीन अलक़ाब का इस्तेमाल करना वाजिब नहीं बल्कि मुसलमानों के उमूर (मुआमलात) पर जिसे भी हुक्मरान मुक़र्रर किया जाये, उसे किसी भी ऐसे लक़ब से पुकारना जायज़ है जो यही मानी रखता हो जैसा कि रईस अलमुस्लिमीन, सुलतान अल-मुस्लिमीन या जिस का मतलब उन अलक़ाबात के मानी के टकराता ना हो। जहां तक इन अलक़ाबात (titles) का ताल्लुक़ है जो एक मख़सूस मानी रखते हैं और हुक्मरानी के मुताल्लिक़ इस्लामी अहकामात से टकराते हैं जैसा कि बादशाह, सदर-ए-जम्हूरीया या शहंशाह, तो मुसलमानों के मुआमलात पर हुक्मरान किसी भी शख़्स के लिए इन अलक़ाबात को अपनाना जायज़ नहीं, क्योंकि ये अलक़ाब जिन तसव्वुरात (अवधारणाओं) की तरफ़ इशारा करते हैं ,वो इस्लाम के अहकामात से टकराव रखते हैं।


ख़लीफ़ा के ओहदे पर मुकर्रर होने की शर्तें:
ख़लीफ़ा के ओहदे की अहलीयत (योग्यता) और इनेक़ादे ख़िलाफ़त (खिलाफत की स्थापना) की बैअत के लिए, ख़लीफ़ा का सात शर्तों पर पूरा उतरना लाज़िम है। ये सात फ़र्ज़ शराइत हैं। अगर इन में से कोई एक शर्त भी मौजूद ना हो तो ख़िलाफ़त का अक़्द (मुआहिदा) अमल मे नहीं आयेगा।

ख़लीफ़ा के तक़र्रुर (नियुक्ती) की शर्तें:
1) पहली: वो मुसलमान हो। कोई काफ़िर किसी भी सूरत में ख़िलाफ़त का अहल नहीं हो सकता और ना ही उस की इताअत फ़र्ज़ होती है। क्योंकि अल्लाह (سبحانه وتعال) ने इरशाद फ़रमाया:

وَلَنْ یَّجْعَلَ اللّٰہُ لِلْکٰفِرِیْنَ عَلَی الْمُؤْمِنِیْنَ سَبِیْلاً

“और अल्लाह (سبحانه وتعال) ने काफ़िरों को मोमिनीन पर हरगिज़ कोई रास्ता (इख्तियार या ग़लबा) नहीं दिया”.
( अन्निसा :141)

हुक्मरानी, एक हाकिम (ruler/शासक) का, महकूम (रिआया) पर रास्ता (ग़लबा) हासिल करने का सबसे मज़बूत ज़रीया है। आयत में मौजूद लफ़्ज़ “लन” (हरगिज़ नहीं) अबदी नफ़ी (स्थायी रुप से इंकार) के लिए इस्तिमाल होता है, जो इस बात का क़रीना (इशारा) है कि कुफ़्फ़ार के लिए मुसलमानों पर हुकूमत करने की मुमानअत, क़तई मुमानअत (नहीं जाज़िम) है ; ख्वाह ये ख़िलाफ़त हो या कोई और हुकूमती ओहदा हो। पस मुसलमानों के लिए हराम है कि वो अपने ऊपर किसी काफ़िर की हाकिमीयत को क़बूल करें।इसके इलावा ख़लीफ़ा अथार्टी का हामिल शख़्स होता है और अल्लाह (سبحانه وتعال) ने ये क़रार दिया कि मुसलमान ही मुसलमानों के मुआमलात के मालिक हों।
अल्लाह (سبحانه وتعال) ने इरशाद फ़रमाया:


یٰأَیُّھَا الَّذِیْنَ اٰمَنُوْآ اَطِیْعُوا اللّٰہَ وَاَطِیْعُواالرَّسُوْلَ وَاُولِی الْاَمْرِمِنْکُمْ

“ए ईमान वालो! इताअत करो अल्लाह (سبحانه وتعال) की और इताअत करो रसूल (صلى الله عليه وسلم) की और अपने में से उन लोगों की जो उलिल अम्र (साहब-ए-इक़तिदार) हैं”.
(अन्निसा: 59)

और इरशाद फ़रमाया:

وَإِ ذَا جَآء ہُمْ أَمْرٌمِّنَ الْاَمْنِ أَوِ الْخَوْفِ أَذَاعُوْا بِہٖ ط وَلَوْرَدُّوہُ إِلَی الرَّسُولِ وَإِلٰٓی أُولِی ا لْأَمْرِمِنْہُمْ

“जब उन्हें कोई ख़ौफ़ या अमन की ख़बर मिली तो उन्होंने उसे मशहूर करना शुरू कर दिया।  अगर वो उसे रसूल صلى الله عليه وسلم की तरफ़ और अपने में से उलिल अम्र लोगों की तरफ़ लौटा देते.”
(अन्निसा: 83)

क़ुरआन में उलिल अम्र की इस्तिलाह (शब्दावली) को हमेशा मुसलमानों के साथ जोडा है और उसे किसी और पीराए (सदंर्भ) में बयान नहीं किया गया, जो इस बात पर दलालत करता है कि मुसलमानों के उलिल अम्र शख़्स का मुसलमान होना लाज़िम है। चूँकि ख़लीफ़ा वो शख़्स है जो लोगों के उमूर (मुआमलात) का मालिक होता है और ऐसे लोगों का तक़र्रुर करता है जो उलिल अम्र होते हैं, जैसे कि मुआवनीन, वाली और आमिल, लिहाज़ा इस के लिए उसे ख़ुद मुसलमान होना ज़रूरी है।
2) दूसरी: वो मर्द हो। औरत के लिए ख़लीफ़ा बनना जायज़ नहीं। यानी ख़लीफ़ा के लिए मर्द होना ज़रूरी है, औरत ख़लीफ़ा नहीं बन सकती। इस की दलील वो रिवायत है जिसे बुख़ारी ने अबी बकर से रिवायत किया, अबी बकर ने कहा: “जमल के दिनों में जब में अस्हाबे जमल में शामिल हो कर उन के हमराह जंग करने वाला था, तो अल्लाह ने मुझे रसूलुल्लाह صلى الله عليه وسلم के इस फ़रमान के ज़रीये फ़ायदा दिया कि आप صلى الله عليه وسلم को जब ये ख़बर मिली कि अहले फ़ारस ने किसरा की बेटी को हुक्मरान बना लिया है तो आप صلى الله عليه وسلم ने इरशाद फ़रमाया:


))لن یفلح قوم ولوأمرھم امرأۃ((
वो क़ौम कभी फ़लाह नहीं पा सकती जो औरत को अपना हुक्मरान बना ले


रसूलुल्लाह صلى الله عليه وسلم का औरत को हुक्मरान बनाने वाली क़ौम के बारे में ये कहना कि वो फ़लाह नहीं पाएगी, औरत को हुक्मरान बनाने की मुमानअत (मनाही) है। इस पेशनगोई (भविष्यवाणी) में तलब मौजूद है । इस ख़बर में औरत को हुक्मरान बनाने वालों की मुज़म्मत यूं की गई कि वो कामयाब नहीं हो सकते, जो कि क़तई मुमानअत (नहीं जाज़िम) की तरफ़ इशारा है। यानी औरत को हुक्मरान बनाने की मुमानअत ऐसे इशारे के साथ आई है जो इस बात पर दलालत करता है कि मुमानअत की ये तलब , तलब-ए-जाज़िम है, चुनांचे औरत को हुक्मरान बनाना हराम है।

हुकूमत से यहां मुराद ख़िलाफ़त और वो दूसरे मनासिब हैं जो हुक्मरानी से मुताल्लिक़ हैं, क्योंकि ये हदीस हुक्मरानी के मौज़ू के साथ मख़सूस है और ये किसरा की बेटी को मलिका बनाने के साथ ख़ास नहीं। इसी तरह ये हदीस आम भी नहीं कि इस का इतलाक़ हर मंसब पर किया जाये बल्कि इस का ताल्लुक़ सिर्फ़ हुकूमत और अथार्टी के उमूर के साथ है। लिहाज़ा हुकूमत के इलावा बाक़ी मनासिब पर इस हदीस का इतलाक़ नहीं होता।

3) तीसरी : तीसरी शर्त ये है कि ख़लीफ़ा बालिग़ हो, ये जायज़ नहीं कि वो बच्चा हो। उस की दलील अबू दाऊद की वो हदीस है जो उन्होंने अली (رضي الله عنه) से रिवायत की कि रसूलुल्लाह صلى الله عليه وسلم ने इरशाद फ़रमाया:


))رُفع القلم عن ثلاثۃ: عن الصبي حتی یبلغ و عن النائم حتی یستیقظ و عن المعتوہ حتی یبرأ((
तीन अफ़राद से क़लम उठा लिया गया है। बच्चे से, जब तक कि वो बालिग़ ना हो जाये, सोए हुए (शख़्स) से, जब तक कि वो बेदार ना हो जाए , और मजनून (पागल) से, जब तक कि उस की अक़्ल वापिस ना लौट आए

एक और रिवायत के अल्फाज़ ये हैं:
))رفع القلم عن ثلاثۃ: عن المجنون المغلوب علی عقلہ حتی یفیق، و عن النائم حتی یستیقظ و عن الصبي حتی یحتلم((

तीन तरह के लोगों से क़लम उठा लिया जाता है मजनून से जब तक कि उस की अक़्ल वापिस ना लौट आए, सोए हुए शख़्स से जब तक कि वो बेदार ना हो जाये और बच्चे से जब तक कि वो बालिग़ ना हो जाये


जिस शख़्स से क़लम उठा लिया जाये वो अपने ज़ाती आमाल का भी ज़िम्मेदार नहीं है। जब वो शरई तौर पर मुकल्लिफ़ ही नहीं तो ये दुरुस्त नहीं कि वो ख़लीफ़ा बने या हुक्मरानी के किसी मंसब पर फ़ाइज़ हो क्योंकि वो मुआमलात को निबटाने की सलाहीयत ही नहीं रखता। उस की एक और दलील बुख़ारी की ये रिवायत है: बुख़ारी ने अबी अक़ील ज़हरहबिन माबद से रिवायत किया कि उस ने अपने दादा अब्दुल्लाह बिन हिशाम से रिवायत किया जो रसूलुल्लाह صلى الله عليه وسلم के ज़माने में मौजूद थे और उन की वालीदा ज़ैनब बिंत हमीद उन्हें रसूलुल्लाह صلى الله عليه وسلم के पास लेकर गईं और कहा: या रसूलुल्लाह صلى الله عليه وسلم उस की बैअत ले लीजिए, तो रसूलुल्लाह صلى الله عليه وسلم ने इरशाद फ़रमाया:


))ھو صغیر فمسح رأسہ و دعا لہ..((
“ये छोटा है” , और आप ने उस के सर पर अपना हाथ फेरा और उस के लिए दुआ फ़रमाई


लिहाज़ा अगर बच्चे की बैअत ग़ैर मोतबर है और इस का ख़लीफ़ा को बैअत देना दुरुस्त नहीं , तो फिर इस का बज़ात-ए-ख़ुद ख़लीफ़ा बनना बदरजा ऊला जायज़ नहीं ।

4) चोथी: वो आक़िल हो, किसी मजनून को ख़लीफ़ा बनाना सही नहीं, क्योंकि रसूलुल्लाह صلى الله عليه وسلم ने फ़रमाया:


(رفع القلم عن ثلاثۃ))،وقال منھا: ( المجنون المغلوب علی عقلہ حتی یفیق )

तीन तरह के लोगों से क़लम उठा लिया जाता है  और ( रसूलुल्लाह صلى الله عليه وسلم ने ) ये बयान किया  मजनून से जब तक कि उस की अक़्ल वापिस ना लौट आए

चुनांचे जिन से क़लम उठा लिया जाये वो मुकल्लिफ़ नहीं रहते क्योंकि अक़ल पर ही तमाम शरई ज़िम्मेदारीयों का दारो मदार है और ये मुआमलात और आमाल की दुरुस्ती की शर्त भी है और ख़लीफ़ा के ज़िम्मे ही मुआमलात को चलाना और तमाम शरई अहकामात को नाफ़िज़ करना है । लिहाज़ा इस का मजनून होना सही नहीं। क्योंकि अगर मजनून अपने मुआमलात की देख भाल नहीं कर सकता और ना ही वो अपने अमल का ज़िम्मेदार है तो फिर वो लोगों के मुआमलात की देख भाल करने से बदरजा ऊला क़ासिर (मजबूर) है।

5) पाँचवी: वो आदिल (इंसाफ पसन्द) हो। फ़ासिक़ का ख़लीफ़ा होना किसी भी सूरत दुरुस्त नहीं। अदल की सिफ़त का मौजूद होना, ख़िलाफ़त के इनेक़ाद और इस के दवाम, दोनों के लिए शर्त है क्योंकि अल्लाह (سبحانه وتعال) ने गवाह के लिए आदिल होने की शर्त रखी है। अल्लाह (سبحانه وتعال) इरशाद फ़रमाता है:

وَاَشْھِدُوْا ذَوَیْ عَدْلٍ مِّنْکُمْ
और अपने में से दो आदिल लोगों को गवाह बनाओ
(अत्तलाक़: 2)

अगर गवाह के लिए आदिल होना ज़रूरी है तो जो शख़्स इस से भी बड़े मरतबे पर फ़ाइज़ हो तो उसे बदरजा ऊला आदिल होना चाहिए। क्योंकि जब गवाह के लिए आदिल होना शर्त है तो ख़लीफ़ा के लिए ये शर्त बदरजा ऊला है।

6) छटी: वो आज़ाद हो। क्योंकि ग़ुलाम आक़ा की मिल्कियत होता है और वह अपने मुआमलात का ख़ुद मालिक नहीं होता। लिहाज़ा उसे दूसरों के मुआमलात पर इख्तियार बदरजा ऊला नहीं हो सकता। पस वो लोगों पर हुकूमत करने का अहल नहीं।

7) सातवीं: वो ख़िलाफ़त की ज़िम्मेदारी का बोझ उठाने पर क़ादिर हो क्योंकि ये बैअत का लाज़िमी हिस्सा है। जिस शख़्स में ये क़ाबिलीयत ना हो वो किताब-ओ-सुन्नत के मुताबिक़ लोगों के मुआमलात नहीं चला सकता, जबकि उसे इस बात पर बैअत दी जाती है।

शराइते अफ़ज़लीयत :

मंदरजा बाला सात शराइत ख़िलाफ़त के इनेक़ाद की लाज़िमी शराइत हैं। इन सात शराइत के इलावा कोई भी शर्त ख़िलाफ़त के इनेक़ाद के लिए लाज़िमी शर्त नहीं। हाँ ये मुम्किन है कि वो शर्त, अफ़ज़लीयत की शर्त हो ,जब इस के मुताल्लिक़ नुसूस मौजूद हों या वो किसी ऐसे शरई हुक्म के बारे में बयान की गई हो जो सही नुसूस से साबित है। किसी शर्त को शर्त-ए-इनेक़ाद सिर्फ़ उस वक़्त कहा जा सकता है जब इस शर्त की दलील में तलब-ए-जाज़िम (निश्चित मांग) मौजूद हो जो इस शर्त के फ़र्ज़ होने पर दलालत करे। लेकिन अगर दलील में मौजूद तलब, तलब-ए-जाज़िम ना हो तो ये सिर्फ़ अफ़ज़लीयत की शर्त होगी। इन सात शराइत के इलावा किसी दलील में तलब-ए-जाज़िम मौजूद नहीं है, लिहाज़ा ये सात शराइत ही ख़िलाफ़त के इनेक़ाद की फ़र्ज़ शराइत हैं।

जहां तक इन दूसरे शराइत का ताल्लुक़ है जिन की दलील सही है, तो ये फ़क़त फ़ज़ीलत की शराइत हैं। चुनांचे ये शर्त कि ख़लीफ़ा के लिए मुज्तहिद होना ज़रूरी है, ख़िलाफ़त के इनेक़ाद की शर्त नहीं क्योंकि कोई ऐसी दलील मौजूद नहीं जो इस शर्त के फ़र्ज़ होने पर दलालत करती हो। ख़लीफ़ा किसी हुक्म के मुताल्लिक़ पूछ सकता है या फिर किसी मुज्तहिद की तक़लीद कर सकता है और अपनी तक़लीद की बिना पर अहकामात की तबन्नी कर सकता है। लिहाज़ा ख़लीफ़ा के लिए मुज्तहिद होना लाज़िम नहीं, ताहम वो मुज्तहिद हो तो ये अफ़ज़ल है। लेकिन अगर वो मुज्तहिद ना हो तो फिर भी उस की ख़िलाफ़त का इनेक़ाद हो जाएगा। इसी तरह ख़लीफ़ा के लिए बहादुर या ज़ीरक (अक़्लमन्द) और मुदब्बिर (योजनाकार) सियासतदान या लोगों के उमूर की देख भाल का माहिर होना भी लाज़िम नहीं क्योंकि इस सिलसिले में कोई सही हदीस मौजूद नहीं और ना ही ये शराइत किसी हुक्मे शरई के तहत आती हैं जो उन्हें शराइत-ए-इनेक़ाद में दाख़िल करता हो। ताहम अगर ख़लीफ़ा बहादुर और साहब-ए-बसीरत हो तो ये बेहतर है। इसी तरह ख़लीफ़ा के लिए नसब के लिहाज़ से क़ुरैशी होना भी लाज़िम नहीं। और जहां तक इस रिवायत का ताल्लुक़ है जो बुख़ारी ने मुआवीया से रिवायत की के मुआवीया ने कहा : मैंने रसूलुल्लाह صلى الله عليه وسلم को ये कहते हुए सुना:


))إن ھذاالأ مر في قریش لا یعادیھم أحد إلا کبہ اللّٰہ علی وجھہ ما أقاموا الدین((
उस वक़्त तक, जब तक कि क़ुरैश दीन को क़ायम रखेंगे, ये मुआमला (ख़िलाफ़त) इन में है। और जो उन से दुश्मनी करेगा उसे अल्लाह औंधे मुँह जहन्नुम में फेंकेगा

और बुख़ारी ने जो हदीस अब्दुल्लाह बिन उमर (رضي الله عنه) से रिवायत की कि रसूलुल्लाह صلى الله عليه وسلم ने फ़रमाया:

))لایزال ھذا الأمر في قریش ما بقي منھم اثنان((
ये मुआमला क़ुरैश में ही रहेगा अगरचे इन में दो लोग ही बाक़ी रह जाएं

ये और इस तरह की दूसरे अहादीस सही उल असनादन (सही सनद) हैं और ये बताती हैं कि हुकूमत क़ुरैश के लोगों के हाथ में होगी। ये अहादीस खबरिया अंदाज़ में वारिद हुई हैं और इन में से कोई हदीस भी हुक़्मीया अंदाज़ में नहीं है। अगरचे इन अहादीस में तलब मौजूद है लेकिन ये तलब, तलब-ए-जाज़िम नहीं क्योंकि इस बात का कोई क़रीना मौजूद नहीं। किसी आयत या सही हदीस में ऐसा क़रीना (इशारा) मौजूद नहीं जो फ़र्ज़ीयत पर दलालत करता हो, जो इस बात की दलील है ख़लीफ़ा का क़ुरैशी अलनसब होना मंदूब है और ये फ़र्ज़ नहीं। लिहाज़ा ये फ़ज़ीलत की शर्त है और ये शर्त-ए-इनेक़ाद नहीं है। जहां तक रसूलुल्लाह صلى الله عليه وسلم के इस इरशाद का ताल्लुक़ है:


))لا یعادیھم أحد إلا کبَّہ اللّٰہ((
जो उन से दुश्मनी करेगा अल्लाह (سبحانه وتعال) उसे औंधे मुँह जहन्नुम में फेंकेगा


इस इरशाद में आप صلى الله عليه وسلم ने क़ुरैश के साथ दुश्मनी करने से मना फ़रमाया है और ये पिछली बात, यानी ये मुआमला क़ुरैश में है ,की ताकीद नहीं है । पस ये हदीस इक़तिदार के क़ुरैश में होने को बयान करती है और इस के इलावा क़ुरैश के साथ दुश्मनी करने से मना करती है। इलावा अज़ीं लफ़्ज़ क़ुरैश इस्म (संज्ञा) है सिफ़त (गुण) नहीं। इल्मुल उसूल की इस्तिलाह में इसे लक़ब कहा जाता है और इस्म यानी लक़ब के मफ़हूम पर कभी भी अमल नहीं किया जाता क्योंकि इस्म लक़ब से कोई मफ़हूम अख़ज़ ही नहीं होता। चुनांचे ख़िलाफ़त को क़ुरैश में बयान करने का ये मतलब नहीं लिया जा सकता कि ये क़ुरैश के इलावा किसी और के हाथ में नहीं हो सकती। नबी अलैहि अस्सलाम के फ़रमान: ये मुआमला क़ुरैश में रहेगा और ये मुआमला (ख़िलाफ़त) क़ुरैश में है का ये मतलब नहीं कि हुकूमत का मुआमला क़ुरैश के इलावा किसी और में होना दुरुस्त नहीं बल्कि मतलब ये है कि हुकूमत क़ुरैश में होगी और क़ुरैश के इलावा किसी और के हाथ में भी हो सकती है। पस क़ुरैश को हुक्मरान के तौर पर बयान करने से ये मुराद नहीं कि किसी और की हुक्मरानी दुरुस्त नहीं । लिहाज़ा ये फ़ज़ीलत की शर्त है, शर्त-ए-इनेक़ाद नहीं।


मज़ीद बरआं रसूलुल्लाह صلى الله عليه وسلم ने अब्दुल्लाह बिन रवाहा (رضي الله عنه), जै़द बिन हारिस(رضي الله عنه) और उसामा बिन जै़द (رضي الله عنه) को इमारत सौंपी लेकिन ये तीनों अश्ख़ास क़ुरैशी ना थे। यानी रसूलुल्लाह صلى الله عليه وسلم ने हुक्मरानी के ओहदा पर क़ुरैश के अलावा दूसरे लोगों को भी फ़ाइज़ किया। अल्फाज़  ھذا الأمر  (हाज़ल अम्र) का मतलब है इख्तियार या अथार्टी यानी हुकूमत, और हुकूमत का इतलाक़ सिर्फ़ ख़लीफ़ा के ओहदे पर नहीं होता। ये बात कि रसूलुल्लाह صلى الله عليه وسلم ने क़ुरैश के इलावा लोगों को भी इमारत सौंपी इस बात पर दलालत करता है कि हुकूमत सिर्फ़ क़ुरैश में ही महदूद नहीं और ये दूसरों के लिए ममनू नहीं। लिहाज़ा अहादीस में अगर चंद लोगों का ज़िक्र किया गया जो ख़िलाफ़त के अहल हैं तो ये उन की फ़ज़ीलत बयान करने के लिए है और इस से मुराद ये नहीं कि ख़िलाफ़त सिर्फ़ उन्ही तक महदूद (सीमित)  है और दूसरे लोग इस से महरूम हैं।


इसी तरह ख़लीफ़ा के लिए हाशमी या अलवी होना भी लाज़िमी नहीं, क्योंकि रसूलल्लाह صلى الله عليه وسلم ने ऐसे लोगों को भी इमारत सौंपी जो बनू हाशिम या बनू अली से ना थे। जब रसूलल्लाह صلى الله عليه وسلم ग़ज़वा तबूक के लिए रवाना हुए तो आप صلى الله عليه وسلم ने मुहम्मद बिन मुसलिमा (رضي الله عنه) को मदीना पर वाली मुक़र्रर किया, जो ना तो हाशमी थे और ना ही अलवी। रसूलुल्लाह صلى الله عليه وسلم ने मआज़ बिन जबल (رضي الله عنه) और अमरो बिन आस (رضي الله عنه) को यमन पर वाली मुक़र्रर किया और ये दोनों अश्ख़ास हाशमी या अलवी ना थे, और ये बात क़तई तौर पर साबित है कि मुसलमानों ने अबूबक्र (رضي الله عنه), उमर (رضي الله عنه) और उसमान (رضي الله عنه) को बैअत दी और अली (رضي الله عنه) ने भी इन में से हर एक को बैअत दी, इस बात के बावजूद कि ये सब बनू हाशिम से ना थे। तमाम सहाबा (رضی اللہ عنھم  ) ने उन की बैअत पर एतराज़ ना किया और किसी सहाबी के बारे में भी ये मनक़ूल नहीं कि उन्होंने महज़ इस बुनियाद पर उन की बैअत से इनकार किया हो कि ये हाशमी या अलवी नहीं हैं। पस सहाबा का इस बात पर इजमा है कि ख़लीफ़ा ग़ैर हाशमी या ग़ैर अलवी भी हो सकता है और उन सहाबा में अली (رضي الله عنه), अब्बास और तमाम बनू हाशिम भी शामिल थे।

जहां तक इन अहादीस का ताल्लुक़ है जो अली (رضي الله عنه) और अहल-ए-बैत की फ़ज़ीलत को बयान करती हैं, तो वो इस बात की दलील नहीं कि ख़िलाफ़त उन के इलावा किसी और को नहीं दी जा सकती बल्कि ये अहादीस बताती हैं कि ये लोग इस के लिए ज़्यादा मौज़ूं हैं।

इस सारी बेहस से ये वाज़िह हो जाता है कि ऐसे कोई दलायल मौजूद नहीं जो इस बात की निशानदेही करते हों कि बयान करदा इन सात शराइत के इलावा भी इनकाद-ए-ख़िलाफ़त (खिलाफत की स्थापना) की कोई फ़र्ज़ शर्त मौजूद है। चुनांचे इन सात शराइत के इलावा दूसरे शराइत अफ़ज़लीयत की शर्तें हैं और ये शरायत-ए-इनेक़ाद नहीं, अगर वो शराइत सही नुसूस पर मबनी हों या किसी सही नस से अख़ज़ करदा शरई हुक्म के ज़िमन में आती हों। शरीयत की रोशनी से ख़िलाफ़त के इनेक़ाद के लिए फ़र्ज़ शराइत का होना ज़रूरी है। अलबत्ता ख़लीफ़ा के चुनाव से पहले उम्मीदवारों में मौजूद फ़ज़ीलतों के मुताल्लिक़ बयान किया जाएगा ताकि लोग उस शख़्स को अपना ख़लीफ़ा मुक़र्रर कर सकें जिसे वो अफ़ज़ल समझते हैं। लेकिन अगर मुसलमान जिस शख़्स को मुंतख़ब (चयनित) करें वो सिर्फ़ शरायत-ए-इनेक़ाद पर पूरा उतरता हो तो उस की ख़िलाफ़त का इनेक़ाद हो जाएगा, ख़ाह इस में दूसरे शराइत मौजूद ना हूँ।


Share on Google Plus

About Khilafat.Hindi

This is a short description in the author block about the author. You edit it by entering text in the "Biographical Info" field in the user admin panel.
    Blogger Comment
    Facebook Comment

0 comments :

इस्लामी सियासत

इस्लामी सियासत
इस्लामी एक मब्दा (ideology) है जिस से एक निज़ाम फूटता है. सियासत इस्लाम का नागुज़ीर हिस्सा है.

मदनी रियासत और सीरते पाक

मदनी रियासत और सीरते पाक
अल्लाह के रसूल (صلى الله عليه وسلم) की मदीने की जानिब हिजरत का मक़सद पहली इस्लामी रियासत का क़याम था जिसके तहत इस्लाम का जामे और हमागीर निफाज़ मुमकिन हो सका.

इस्लामी जीवन व्यवस्था की कामयाबी का इतिहास

इस्लामी जीवन व्यवस्था की कामयाबी का इतिहास
इस्लाम एक मुकम्म जीवन व्यवस्था है जो ज़िंदगी के सम्पूर्ण क्षेत्र को अपने अंदर समाये हुए है. इस्लामी रियासत का 1350 साल का इतिहास इस बात का साक्षी है. इस्लामी रियासत की गैर-मौजूदगी मे भी मुसलमान अपना सब कुछ क़ुर्बान करके भी इस्लामी तहज़ीब के मामले मे समझौता नही करना चाहते. यह इस्लामी जीवन व्यवस्था की कामयाबी की खुली हुई निशानी है.