क्या इस्लाम की तरफ़ दावत देने वाली जमातों का एक से अधिक होना जायज़ है ?

इस किताब के विषयों में हम ने कोशिश की कि हम ऐसा कामिल और मुकम्मल तसव्वुर दें जो किसी भी तेहरीक या हिज़्ब या जमात के बारे में उसके प्रोग्राम की नौईयत का स्पष्टीकरण करे। हम अगर तफ़्सीलात में नहीं गए सिर्फ़ उन बुनियादी बातों का ज़िक्र किया जिनकी रियायत ज़रूरी है या जमात की तफ़्सीलात को इसके मुज्तहिदीन पर छोड़ा जाता है। इस मैदाने-अमल में बहुत सारी कोशिशें की जा रही हैं जिनकी बुनियाद ही सही नहीं, बहुत सारी ऐसी जमातें हैं जिनके बारे में ये कहना ही दुरुस्त नहीं कि वो जमात के हवाले से शरअ में मौजूद शर्तों को पूरा करती हैं । ये सिर्फ़ मुसलमानों की जमीअतें हैं जो ऐसे जुज़वी काम (partial work) करते हैं जो कि जुज़वी मसाइल तक को हल नहीं कर सकते, ये मुकम्मल शरई तरीक़े से ग़ाफ़िल हैं ।
ये इस्लाम को इस तरह इख़्तियार ही नहीं करते कि इस्लाम को मुकम्मल तौर पर उम्मते मुस्लिमा की ज़िंदगीयों तक पहुंचाएं । ये जमातें बहुत ज़्यादा हो गईं हैं यहाँ तक कि एक एक मुल्क में सैंकड़ों तक पहुंच गईं हैं, इन लोगों ने अपनी अपनी दुकानें चमकायी और मुसलमानों की तवज्जो और काम को ज़ाए करने के लिए पूरा ज़ोर लगाया। इन बहुत सारी जमातों (जमीअतों) की मौजूदगी के साथ बहुत ही कम बड़ी जमातें रहती हैं जो कि इस्लामी उद्देश्यों और उनकी प्राप्ति के काम से बहुत दूर हैं । अगर इन दुकान चमकाने वालों का ज़िक्र ही ना करें, बल्कि हम उन बड़ी जमातों का ही ज़िक्र करें जो बहुत दूर का ख़्वाब देख रही हैं और मुकम्मल काम का दावा कर रही हैं, क्या शरअन आवश्यक ये है कि: एक ही ऐसी जमात होनी चाहिए जो मुकम्मल काम करे और मतलूब को हासिल करे? या शरई उसूल के अंदर तब्दीली के लिए काम करने वाली जमातों का एक से अधिक होना जायज़ है? अमल के जुज़वी या मुकम्मल और सतुंलित होने का माअनी क्या है? ये कोशिशें इलाक़ाई होनी चाहिए या आलमी?

इस्लामी काम का एक या एक से अधिक होना ऐसा उचित है जिसे इख़्तियार और रद्द करने में कोई मुज़ायक़ा नहीं, कुछ लोग तब्दीली लाने के लिए इस्लाम (इस्लामी दावत) के एक ही होने को वाजिब समझते हैं, जब कि कुछ लोग इसके एक से अधिक होने की इजाज़त देते हैं । जब हम हुज्जत की फ़रुआत को उसूल की तरफ़ लौटाएंगे तब हम जो अज़ के बारे शरई दलायल में फर्क़ कर पाऐंगे। यूं हमें खरा और खोटा मालूम हो जाएगा।

अगर हम इस्लामी काम की वहदत वाली राय पर नज़र दौड़ाएं तो हमें मालूम हो जाएगा कि उनके नज़दीक 

वजूब (वाजिब होना) निम्न लिखित शीर्षकों के तहत है:
उनवान अव्वल: इस्लामी काम की वहदत एक शरई फ़रीज़ा है।
उनवान सानी: इस्लामी काम की वहदत तेहरीकी ज़रूरत है।
  1. इसके एक शरई फ़रीज़ा होने के दलायल निम्न लिखित जे़ल हैं :
  2. मुसलमानों और उम्मतें मुस्लिमा की वहदत ही असल चीज़ है।
 इरशाद है:


﴿إِنَّ هَـٰذِهِۦۤ أُمَّتُكُمۡ أُمَّةً۬ وَٲحِدَةً۬ وَأَنَا۟ رَبُّڪُمۡ فَٱعۡبُدُونِ﴾
“यक़ीनन तुम्हारी ये उम्मत एक ही उम्मत है, मैं तुम्हारा रब हूँ पस मेरी इबादत करो।” (21 सूरह अंबिया:92)
फ़रमाया:


    ﴿وَإِنَّ هَـٰذِهِۦۤ أُمَّتُكُمۡ أُمَّةً۬ وَٲحِدَةً۬ وَأَنَا۟ رَبُّڪُمۡ فَٱتَّقُونِ﴾
“और यह तुम्हारी जमात (हक़ीक़त में) एक ही जमात है और मैं तुम्हारा परवरदिगार हूँ तो मुझ से डरों”  {23:52}


((مثل المؤمنين في توادهم و تراحمهم و تعاطفهم مثل الجسد،
إذا اشتكى منه عضو تداعى له سائر الجسد بالسهر و الحمى))

“आपस में मुहब्बत, रहमत और मेहरबानी में मोमिनों की मिसाल एक जिस्म की है, जब इसके एक हिस्से में तक्लीफ़ होती है तो पूरा जिस्म बुख़ार और बे-आरामी का शिकार होता है ।”  (बुख़ारी, मुस्लिम व अहमद)

(ब) अस्लन वहदत की तरग़ीब दी गई है और इख़्तिलाफ़ से मना किया गया है: इरशाद बारी है:


﴿وَلَا تَكُونُواْ كَٱلَّذِينَ تَفَرَّقُواْ وَٱخۡتَلَفُواْ مِنۢ بَعۡدِ مَا جَآءَهُمُ ٱلۡبَيِّنَـٰتُۚ وَأُوْلَـٰٓٮِٕكَ لَهُمۡ عَذَابٌ عَظِيمٌ۬﴾ 
“तुम उन लोगों की तरह मत हो जाओ जिन्होंने इख़्तिलाफ़ किया और फ़िरक़े बन गए इसके बाद उनके पास वाज़ेह निशानीयां आएं और उन्ही लोगों के लिए बहुत बड़ा अज़ाब है ।” (3:105)
मज़ीद फ़रमाया:


﴿إِنَّ ٱلَّذِينَ فَرَّقُواْ دِينَہُمۡ وَكَانُواْ شِيَعً۬ا لَّسۡتَ مِنۡہُمۡ فِى شَىۡءٍۚ إِنَّمَآ أَمۡرُهُمۡ إِلَى ٱللَّهِ ثُمَّ يُنَبِّئُہُم بِمَا كَانُواْ يَفۡعَلُونَ﴾
“बेशक जिन लोगों ने अपने दीन में तफ़रीक़ की और गिरोह बन गए हम पर उनके बारे में कोई ज़िम्मेदारी नहीं, उनका मामला अल्लाह के पास है, फिर उनको उनके आमाल के बारे में बताएगा।”  (6:159)
(ज) असल हुक्म जमात (community) से चिपके रहना है, जमातों (groups) से नहीं:

रसूलुल्लाह (صلى الله عليه وسلم) का इरशाद है:
((ستكون هنات و هنات. فمن أراد أن يفرق أمر هذه
الأمة وهي جميع فضربوه بالسيف كائناً من كان))
“अनक़रीब ऐसे वैसे लोग होंगे, जो इस उम्मत में तफ़र्रुक़ा पैदा करने की कोशिश करेंगे हालाँकि उम्मत एक है तो उसको तलवार से मारो चाहे ये कोई भी हो।” (मुस्लिम)
दूसरी हदीस है कि:

((دعانا النبي فبايعناه. فقال فيما أخذ علينا أن بايعناه
على السمع و الطاعة في منشطنا و مكرهنا، و عسرنا
و يسرنا، و أثرةٍ علينا، وأن لا ننازع الأمر أهله قال
إلا أن تروا كفراً بواحاً عندكم من الله فيه برهان))
“नबी ने हमें बुलाया तो हम ने आप की बैअत की। आप ने हम से जो बैअत ली वो ये कि हम अपनी अपनी पसंद और नापसंद,  अपनी तंगी और ख़ुशहाली और अपने ऊपर दूसरों को तर्जीह देने की सूरत में भी सुनें और इताअत करें, उलिलअम्र से तनाज़ा ना करें फ़रमाया : मगर तुम खुल्लम खुल्ला कुफ्र देखो जिसकी तुम्हारे पास अल्लाह (سبحانه وتعال) की तरफ़ से दलील हो।”

रसूलुल्लाह (صلى الله عليه وسلم) की ये हदीस भी है कि :


((الجماعة رحمة و الفرقة عذاب))
“जमात रहमत है और तफ़र्रुक़ा बाज़ी अज़ाब है।”      (अल-इमाम अहमद)
रसूलुल्लाह (صلى الله عليه وسلم) का ये फ़रमान भी है कि:
((يد الله مع الجماعة))
“अल्लाह की मदद जमात के साथ है।” (तिर्मीज़ी व निसाई)

(2) जहां तक उसकी तेहरीकी और शरई ज़रूरत की बात है इसके कई कारण हैं जिनमें कुछ ये हैं:

(अ) बेशक इस्लामी तब्दीली लाना कठिन काम है, जाहिलियत की क़ुव्वतों को ख़त्म करना आसान नहीं. इस्लाम की फिक्र और निज़ाम की फितरत समाज को हिफाज़त मुहय्या कराने की है. यह फितरत इस बात का तक़ाज़ा करती है की हम सफबस्ता हो कर वहदत का रंग इख्तियार कर ले और बटे हुये न रहे।

(ब) इस्लाम और इस्लामी तेहरीक के ख़िलाफ़ आलमी गठजोड़ का मुक़ाबला करने के लिए भी काम और जमात की वहदत ज़रूरी है। जब इस्लाम के अज़ली दुश्मन आलमी ताक़त में इस्लाम के ख़िलाफ़ साज़ी करते हुए तआवुन और इत्तिहाद में क़ायम करते हैं तो क्यों ना आलमे इस्लाम की इस्लामी ताक़तें वहदत की दावत दे दें ताकि ये तर निवाला ना बन जाएं और उसको तबाह करना आसान ना हो।

अगर इस्लामी अमल की वहदत मब्दा के लिहाज़ से एक शरई फ़रीज़ा ना होती तब मुसलमानों की शीराज़ा बंदी की हिफ़ाज़त मुम्किन ना होती और इसको मुअत्तल करने और मुसलमानों का सफ़ाया करने पर सज़ा ना होती ।

(ज) इस्लाम दुश्मन इलाक़ाई ताक़ते और एहज़ाब (parties) आज इस्लाम के ख़िलाफ़ महाज़ (strong fronts) बना रही हैं, ये हर क़िस्म तदरीस करते हैं, तैय्यारी करते हैं, मंसूबे बनाते हैं और भरपूर कोशिश कर रहे हैं, क्या फिर इस्लामी कुव्वतों को इस सूरते-हाल का इदराक (बोध/perception) नहीं करना चाहिए फिर कहाँ ये गुंजाइश है कि ये मुंतशिर और बटे हुए रहें? बल्कि उन पर तो ये लाज़िम है कि ये अपनी वहदत के रास्ते में आने वाली हर रुकावट को ख़त्म करें और तमाम एतबारात को छोड़कर वहदत इख़्तियार करें ।

ये और इस किस्म की दूसरी कई वजूहात के आधार पर इसमें कोई शक बाक़ी नहीं रहता कि एक वाहिद आलमी तेहरीक के क़याम की ज़रूरत है। फ़िक्री, तंज़ीमी मंसूबा बंदी और तैय्यारी हर लिहाज़ से आला सतह की हो। ये हैं वो दलायल और वजूहात जिनके आधार पर कुछ लोग इस्लामी अमल की वहदत को फ़र्ज़ और इसके अनेक होने को हराम समझते हैं । हम सूरते हाल पर इन दलायल को मुंतबिक़ (apply) करने के लिए इज्तिहाद का इस्लामी तरीक़ा इख़्तियार करें । हम पहले भी ये बता चुके हैं कि मुसलमानों की सूरते-हाल ये है कि वो दारुल-कुफ्र में ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं । अब इस दारुल-कुफ्र को दारुल-इस्लाम में बदलना फ़र्ज़ है। हम ये भी कह चुके हैं कि इस काम के लिए एक जमात की ज़रूरत है जो इस मक़सद को हासिल कर सके। इस काम के लिए रसूलुल्लाह (صلى الله عليه وسلم) के नक़्शे-क़दम पर चलना फ़र्ज़ है। अब जो चीज़ ज़रूरी है, लेकिन इस राय के इख़्तियार करने वालों ने जिन शरई दलायल पर भरोसा किया है उनकी तरफ़ आने से पहले, इस काम को करने वाली जमात की हक़ीक़त को स्पष्ट करना ज़रूरी है। क्या ये मुसलमानों की जमात है या मुसलमानों की जमात में से है, या दूसरे शब्दों में, ये मुसलमानों में से एक जमात है?

इस बात को समझने के लिए हम कहते हैं कि अल्लाह (سبحانه وتعال) ने कुछ फ़राइज़ फ़र्ज़ किए हैं जिनकी अदायगी के लिए काम करना मुसलमानों पर फ़र्ज़ है। इन फ़राइज़ में से कुछ व्यक्तिगत हैं, यानी मुसलमान उनको व्यक्तिगत तौर पर अदा करेगा और जब तक उनको अदा नहीं करेगा वो पूरे नहीं होगे। इन में कुछ ऐसे हैं जिनकी अदायगी के लिए जमात की ज़रूरत है, इस किस्म के फ़राइज़ में से एक फ़र्ज़ इस्लामी रियासत के क़याम के लिए काम करना है। पस अल्लाह (سبحانه وتعال) की शरीयत का निफ़ाज़ फ़र्ज़ है एक फ़र्द व्यक्तिगत तौर पर इसकी इस्तिताअत नहीं रखता, बल्कि इसके लिए हाथों में हाथ डाल कर एक होना और बहुत सारे इरादों का जमा होना ज़रूरी है।

ये इस उसूल के तहत है कि
(ما لا يتم الواجب إلا به فهو واجب)
“जिस अमल के के बगै़र फ़र्ज़ अदा नहीं होता वो अमल भी फ़र्ज़ है।”

ये फ़र्ज़ उन किफ़ाई फ़राइज़ में से है जिनकी अदायगी फ़र्ज़ है। उनकी अदाइगी न होने पर, उसकी अदायगी के लिए कोशिश ना करने वाले सख़्त गुनहगार होंगे। लेकिन उसकी अदायगी के लिए तमाम मुसलमानों की ज़रूरत नहीं बल्कि इतने लोग काफ़ी हैं जो इस काम को कर सकें । यानी मुसलमानों में से एक जमात की ज़रूरत है । इस जमात की तरफ़ से इस फ़र्ज़ की अदायगी के लिए काम करने से जमात के अफ़राद से तो गुनाह हट जायेगा लेकिन उन लोगों से गुनाह हटेगा नहीं होगा जो काम नहीं कर रहे हैं । मुसलमानों में से ये जमात ही मुसलमानों की जमात नहीं क्योंकि बहुत सारे मुसलमान अफ़राद हैं जो इसके साथ काम नहीं करते बल्कि इसके लिए किसी और के साथ काम करते हैं जिसका ज़िक्र हम जमातों के मुतअद्दिद (एक से अधिक) होने के जवाज़ (सबूत) के बारे में बात करते हुए करेंगे, या कुछ मुसलमान किसी भी जमात के साथ काम नहीं करते। ये जमात ख़लीफ़ा नहीं ना ही इसकी जगह ले सकती है। ख़लीफ़ा से मुतअद्दिद अहकाम इसके लिए नहीं उसको ये हक़ भी हासिल नहीं कि वो इन आमाल को ख़ुद अंजाम देने की कोशिश करे जिनको अंजाम देना ख़लीफ़ा की ज़िम्मेदारी है। बल्कि ये सिर्फ़ मुसलमानों में से एक जमात है, जब पूरी उम्मते मुस्लिमा मुसलमानों की जमात है । जमात या जमातें, अफ़राद और ख़लीफ़ा सब इसमें शामिल हैं ।


मुसलमानों की जमात उम्मते मुस्लिमा है जिनको अहकामे शरई ने नहीं बल्कि इस्लामी अक़ीदे ने जमा किया और भाई बनाया। इसलिए मुसलमान फ़रु में इख़्तिलाफ़ करते हैं लेकिन इस इख़्तिलाफ़ की वजह से अपने भाईयों पर ऐब नहीं लगाते। अगरचे अहकामात भाई बंदी का मियार होते तो कोई मुसलमान किसी मुसलमान का भाई ना होता। किसी भी फ़र्द या जमात का मुसलमानों के अक़ीदे से ख़ुरूज (बाहर निकलना) उम्मते मुस्लिमा से ख़ुरूज है और इसकी वजह से ये जहन्नुम में जाऐंगे, रसूलुल्लाह (صلى الله عليه وسلم) की इस हदीस का मक़सद भी ये है कि :

((التارك لدينه المفارق للجماعة))
 

“अपने दीन को छोड़ने वाला जमात से जुदा है।”  (बुख़ारी व मुस्लिम)

यानी मुसलमानों की जमात से जुदा है। रसूलुल्लाह (صلى الله عليه وسلم) की इस दूसरी हदीस का भी यही मक़सद है कि :
((... و تفترق أمتي على ثلاث و سبعين فرقة كلها في النار إلا
واحدة قالوا: ومن هي يا رسول الله؟ ما أنا عليه و أصحابي))
 

“मेरी उम्मत सत्तर फ़िरक़ों में बंट जाएगी एक के सिवा वो सब जहन्नुमी होंगे अर्ज़ किया गया वो एक कौनसा होगा? फ़रमाया: जिस पर में और मेरे सहाबा (رضی اللہ عنھم) हैं।”     (अबु दाउद, तिर्मीज़ी, इब्ने माजा, इब्ने हन्बल)

मुसलमानों की जमात या उम्मते मुस्लिमा दूसरे लोगों से अलग अलग उम्मत हैं । मुसलमानों का खून और माल एक है, इन में क़रीब वाला दूर वाले को पनाह देगा, दूसरों के ख़िलाफ़ ये एक हैं, अगरचे उनके इफ़हाम (understandings) मुतअद्दिद और इज्तिहाद मुख़्तलिफ़ हो।


इस वजह से मुसलमानों की जमात और मुसलमानों में से एक जमात में वाज़ेह फ़र्क़ है। ये बहुत बड़ी ग़लती होगी कि हम मुसलमानों की जमात से मुताल्लिक़ा दलायल को मुसलमानों की एक जमात पर मुंतबिक़ करने की कोशिश करें। लिहाज़ा अल्लाह (سبحانه وتعال) का ये इरशाद कि:


    ﴿إِنَّ هَـٰذِهِۦۤ أُمَّتُكُمۡ أُمَّةً۬ وَٲحِدَةً۬ وَأَنَا۟ رَبُّڪُمۡ فَٱعۡبُدُونِ﴾
“यक़ीनन तुम्हारी ये उम्मत एक ही उम्मत है, में तुम्हारा रब हों पस मेरी इबादत करो।”     (21:92)

या ये इरशाद कि :

    ﴿    وَإِنَّ هَـٰذِهِۦۤ أُمَّتُكُمۡ أُمَّةً۬ وَٲحِدَةً۬ وَأَنَا۟ رَبُّڪُمۡ فَٱتَّقُونِ﴾
 “और ये कि तुम्हारी ये उम्मत एक ही उम्मत है और सब ही तुम्हारा रब हों पस मुझ से डरो।”    (23:52)

और रसूलुल्लाह (صلى الله عليه وسلم) का ये इरशाद कि :

((مثل المؤمنين في توادهم و تراحمهم و تعاطفهم مثل الجسد،
إذا اشتكى منه عضو تداعى له سائر الجسد بالسهر و الحمى))

 

“आपस में मुहब्बत, रहमत और मेहरबानी में मोमिनों की मिसाल एक जिस्म की है, जब इसके एक हिस्से में तक्लीफ़ होती है तो पूरा जिस्म बुख़ार और बे-आरामी का शिकार होता है।”    (बुख़ारी, मुस्लिम व अहमद)


इस से मुराद पूरी उम्मते मुस्लिमा है ना कि मुसलमानों में से एक जमात नहीं । नहीं अगर कोई भी जमात ये समझने लगे कि वो मुसलमानों की जमात है तो ये फ़ाश ग़लती और अजीबो-ग़रीब बात होगी जिसके बहुत ख़तरनाक नताइज बरामद होंगे इसका मतलब ये होगा कि जो इस जमात में नहीं वो इखवत में शरीक नहीं गोया कि वो दीन को छोड़ने वाले और मुसलमानों की जमात से जुदा हैं और ये जहन्नुम में जाऐंगे।

रही बात उनके बाक़ौल मुतअद्दिद जमातों के निषेध होने की जिसके ये दलायल हैं कि:


﴿وَلَا تَكُونُواْ كَٱلَّذِينَ تَفَرَّقُواْ وَٱخۡتَلَفُواْ مِنۢ بَعۡدِ مَا جَآءَهُمُ ٱلۡبَيِّنَـٰتُۚ وَأُوْلَـٰٓٮِٕكَ لَهُمۡ عَذَابٌ عَظِيمٌ۬﴾
“तुम उन लोगों की तरह मत हो जाओ जिन्होंने इख़्तिलाफ़ किया और फ़िरक़े बन गए इसके बाद उनके पास वाज़ेह निशानीयां आएं और इन्हीं लोगों के लिए बहुत बड़ा अज़ाब है।” (3:105)

और ये इरशाद कि :
إِنَّ ٱلَّذِينَ فَرَّقُواْ دِينَہُمۡ وَكَانُواْ شِيَعً۬ا لَّسۡتَ مِنۡہُمۡ فِى شَىۡءٍۚ﴿ إِنَّمَآ أَمۡرُهُمۡ إِلَى ٱللَّهِ ثُمَّ يُنَبِّئُہُم بِمَا كَانُواْ يَفۡعَلُونَ﴾
“बेशक जिन लोगों ने अपने दीन में तफ़रीक़ की और गिरोह बन गए हम पर उनके बारे में कोई ज़िम्मेदारी नहीं, उनका मामला अल्लाह (سبحانه وتعال) के पास है, फिर उनको उनके आमाल के बारे में बताएगा।”      (6:159)

लिहाज़ा ये दलायल इस सूरते-हाल पर मुंतबिक़ ही नहीं होते जहां इसको इस्तिमाल करने की कोशिश की गई है।

इन दो आयतों का जमातों के मुतअद्दिद होने के विषय से कोई ताल्लुक़ नहीं । इनके विषय का ताल्लुक़ अक़ाइद से है अहकामे शरीया से नहीं ।

जो जमात सूरते-हाल को तब्दील करने के लिए काम कर रही है वो अहकामे शरीया की वजह से दूसरों से अलग है। ये मुसलमानों की एक जमात है जिसका अक़ीदा इस्लामी है। दूसरों से इसका इख़्तिलाफ़ अक़ीदे में नहीं बल्कि अहकाम में है। लिहाज़ा ये आयत उन लोगों के बारे में है जिन्होंने अक़ीदे में मुसलमानों से इख़्तिलाफ़ किया ये अहकाम में इख़्तिलाफ़ करने वालों के बारे में नहीं । इज्तिहाद के मुतअद्दिद होने के विषय से इसका कोई ताल्लुक़ ही नहीं ।


अगर ये कहा जाये कि आयत आम है और एतबार लफ़्ज़ की उमूमीयत का होता है कारण के मख़्सूस होने का नहीं, तो इसका जवाब ये है कि इसमें जो उमूमीयत है वो सिर्फ़ उस विषय में है जिसके बारे में ये आयत नाज़िल हुई है, ये आम है लेकिन सिर्फ़ अक़ाइद में मुख़ालिफ़त तक किसी और चीज़ में नहीं, ये एक लिहाज़ से है। दूसरे लिहाज़ से ये समझना इन अहादीस की मुख़ालिफ़त है जिनमें इज्तिहाद में इज्तिहाद में इख़्तिलाफ़ को जायज़ क़रार दिया गया है। तीसरे लिहाज़ से इस से ये मालूम होता है कि ये लोग समझते हैं कि जो उनसे इख़्तिलाफ़ करे वो दीन से अलग होना है।


जहां तक दूसरी आयत का ताल्लुक़ है:



إِنَّ ٱلَّذِينَ فَرَّقُواْ دِينَہُمۡ وَكَانُواْ شِيَعً۬ا لَّسۡتَ مِنۡہُمۡ فِى شَىۡءٍۚ﴿ إِنَّمَآ أَمۡرُهُمۡ إِلَى ٱللَّهِ ثُمَّ يُنَبِّئُہُم بِمَا كَانُواْ يَفۡعَلُونَ﴾
“बेशक जिन लोगों ने अपने दीन में तफ़रीक़ की और गिरोह बन गए हम पर उनके बारे में कोई ज़िम्मेदारी नहीं, उनका मामला अल्लाह (سبحانه وتعال) के पास है, फिर उनको उनके आमाल के बारे में बताएगा।”      (6:159)

इब्ने कसीर (رحمت اللہ علیہ) ने कहा कि:


((هم أصحاب البدع))
 
“ये बिदअती लोग हैं” यानी ये फ़िरक़े थे जैसे अहले मिलल और निहल (गुमराह फ़िरक़े) और नफ़्स परस्त और गुमराह लोग, अल्लाह (سبحانه وتعال) ने अपने रसूल को उनसे बरी क़रार दिया । हमज़ा और कसाई की क़िरअत के मुताबिक़ अली (رضي الله عنه) बिन अबी तालिब से रिवायत है कि


﴿إِنَّ الَّذِينَ فَرَّقُواْ دِينَهُمْ﴾ {6:159}
यानी वो लोग जिनको दीन का हुक्म दिया गया था लेकिन उन्होंने छोड़ दिया और ये यहूद व नसारा है


{6:159} ﴿لَّسْتَ مِنْهُمْ فِي شَيْءٍ﴾
इमाम बैज़ावी ने कहा: “यानी उन्होंने दीन को मुंतशिर करके रख दिया और बाअज़ पर ईमान लाए और बाअज़ का इनकार किया, फ़िरक़े बन गए।”

जी हाँ अक़ाइद में इख़्तिलाफ़ फ़रु में इख़्तिलाफ़ से भिन्न है। ये दलायल पहली चीज़ के बारे में हैं जिनमें मना किया गया है कि हम यहूद वनसारा की तरह ना हों जिन्होंने अपने अंबिया से इख़्तिलाफ़ किया और अपने दीन को छोड़कर बिदअत और गुमराही की तरफ़ गए यूं ये फ़िरक़े बन गए। ये आयत इसकी तफ़सीर कर रही है:
(2:253)   ﴾ وَلَـٰكِنِ ٱخۡتَلَفُواْ فَمِنۡہُم مَّنۡ ءَامَنَ وَمِنۡہُم مَّن كَفَرَۚ﴿

“लेकिन उन्होंने इख़्तिलाफ़ किया पस इन में से बाअज़ ईमान लाए और बाअज़ ने कुफ्र किया।”
ये विषय ही ईमान और कुफ्र है। रही बात दूसरे इख़्तिलाफ़ की तोन्स कि श्रेणी में फ़ेहम के इख़्तिलाफ़ के जवाज़ के बारे में तो बहुत सारे दलायल हैं । ये बात मुसलमानों के उल्मा को मालूम है। ये फ़ाश ग़लती है कि अक़ाइद में इख़्तिलाफ़ के जायज़ होने के दलायल को जमातों के एक से अधिक ना होने के लिए दलील बनाई जाये, बशर्तिके ये जमात अहकामे शरीया की बुनियाद पर क़ायम हों । ये दलायल कि :


((ستكون هنات و هنات. فمن أراد أن يفرق أمر هذه

الأمة وهي جميع فضربوه بالسيف كائناً من كان))
“अनक़रीब ऐसे वैसे लोग होंगे, जो इस उम्मत में तफ़र्रुक़ा पैदा करने की कोशिश करेंगे हालाँकि उम्मत एक है तो उसको तलवार से मारो चाहे ये कोई भी हो।”    (मुस्लिम)
 

और ये कि :

((من فرق ليس منا))
“जो तफ़र्रुक़ा बाज़ी करे वो हम में से नहीं”
और ये कि :

((دعانا النبي فبايعناه. فقال فيما أخذ علينا أن بايعناه
على السمع و الطاعة في منشطنا و مكرهنا، و عسرنا
و يسرنا، و أثرةٍ علينا، وأن لا ننازع الأمر أهله قال
إلا أن تروا كفراً بواحاً عندكم من الله فيه برهان))

 
“नबी ने हमें बुलाया तो हम ने आप की बैअत की। आप ने हम से जो बैअत ली वो ये कि हम अपनी अपनी पसंद और नापसंद, अपनी तंगी और ख़ुशहाली और अपने ऊपर दूसरों को तर्जीह देने की सूरत में भी सुनें और इताअत करें,  उलिलअम्र से तनाज़ा ना करें फ़रमाया : मगर तुम खुल्लम खुल्ला कुफ्र देखो जिसकी तुम्हारे पास अल्लाह (سبحانه وتعال) की तरफ़ से दलील हो।”




इन तमाम दलायल का ताल्लुक़ ख़लीफ़ा, उसकी बैअत पर इताअत और इसके ख़िलाफ़ ख़ुरूज ना करने के हवाले से हैं सिवाए ये कि वो खुल्लम खुल्ला कुफ्र करे। फिर कोई ऐसा शख़्स आता है जो ख़लीफ़ा से झगड़ता है और इस उम्मत को मुंतशिर करना चाहता है तो उसको तलवार से मारो चाहे कोई भी हो, इन दलायल का मुसलमानों की किसी जमात से दूर दूर तक कोई ताल्लुक़ नहीं क्योंकि ये ख़लीफ़ा से संबधित अहकाम हैं जमात इसकी जगह नहीं बल्कि जमात का काम ख़लीफ़ा को नियुक्त करना और उसका एहतिसाब करना है।
ये हदीस कि
((يد الله مع الجماعة))
“अल्लाह (سبحانه وتعال) की मदद जमात के साथ है।”    (तिर्मीज़ी व निसाई)

या ये हदीस कि:

((الجماعة رحمة و الفرقة عذاب))
“जमात रहमत है और तफ़र्रुक़ा बाज़ी अज़ाब है।” (अल-इमाम अहमद)


इसका जमातों की तादाद से कोई ताल्लुक़ नहीं मुसलमानों को मुसलमानों की जमात या मुसलमानों में से एक जमात के साथ हिफ़ाज़त से रहने की रहमत का एहसास है। जमात से दूर और फ़िर्कावारीयत से मुसलमान शैतान के क़रीब होता है और इस पर रसूलुल्लाह (صلى الله عليه وسلم) का ये फ़रमान सादिक़ आता है कि:


(فانما یالحل الذئب القاصیة۔)

“भेड़ीया रेवड़ से निकलने वाले को खाता है।”  
 
यही अज़ाब है, इन दोनों हदीसों के मानी और मफ़हूम में कहीं भी इस बात की दलील नहीं कि शरीयत के क़याम के लिए इस्लामी अमल एक ही होना वाजिब है। ये तो जमातों की तादाद के नाजायज़ होने के बारे में शरई दलायल थे हालाँकि ये सब उस पर मुंतबिक़ नहीं होते।

जो अक़्ली वजूहात बयान की गई हैं और जो तादाद के जो नकारात्मक प्रभाव ज़िक्र किए गए हैं उनसे कोई चीज़ ममनू, हराम या वाजिब नहीं हो सकती बल्कि ममनू या वाजिब सिर्फ़ शरअ करती है, सूरते-हाल अगर ख़राब है तो उसको अच्छी तरह समझना चाहिए, उसकी हक़ीक़त का ज्ञान होना चाहिए, तो इसके ईलाज के लिए शरअ की तरफ़ रुजू करना चाहिए ताकि इसके हराम या वाजिब होने के दलायल सामने आएं । इस बुनियाद पर हम सूरते-हाल से कोई हुक्म शरई नहीं ले सकते।

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